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दिल्ली कोचिंग हादसे पर हाईकोर्ट ने अधिकारियों को लगाई फटकार, रेवड़ी संस्कृति पर भी साधा निशाना

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में तीन छात्रों की मौत के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाई और कहा कि जब “मुफ्तखोरी की संस्कृति” के कारण कर संग्रह नहीं होता है तो ऐसी दुर्घटनाएं होती ही रहती हैं। अदालत आज कुटुंब नामक संस्था की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कोचिंग सेंटर हादसे की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है। संस्था की तरफ से अधिवक्ता रुद्र विक्रम सिंह ने मामला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ के समक्ष उठाया।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक अजीब जांच चल रही है, जिसमें कार चलाने वाले राहगीर के खिलाफ पुलिस कार्रवाई कर रही है, लेकिन एमसीडी अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। अदालत ने पूछा कि क्या अब तक किसी एमसीडी अफसर को हिरासत में लिया गया है? साथ ही यह भी पूछा कि क्या इस मामले में एमसीडी के अधिकारियों की जांच हुई?

अदालत ने कहा कि बहुमंजिला इमारतों को चलने दिया जा रहा है, लेकिन उचित जल निकासी नहीं है। न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि “आप मुफ्तखोरी की संस्कृति चाहते हैं, कर संग्रह नहीं करना चाहते, ऐसा होना तय है।” अधिकारियों पर कटाक्ष करते हुए अदालत ने कहा कि उन्हें बुनियादी ढांचे का निर्माण करने की जरूरत है, लेकिन वे दिवालिया हैं और वेतन भी नहीं दे सकते। 

याचिकाकर्ता ट्रस्ट कुटुंब का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता रुद्र विक्रम सिंह ने तर्क दिया कि ओल्ड राजेंद्र नगर में जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण से कहीं अधिक है। इसी तरह से एक होटल में आग लगी थी और इसमें एक आईआरएस, एक विदेशी की मौत हुई थी। इसके अलावा मुखर्जी नगर, अनाज मंडी के साथ ही मुनिरका में बेबी केयर में आग की घटना हुई थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि हम एक तरह के जंगल में रह रहे हैं जहां लोग आग और पानी की वजह से मर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि राव आइएएस के संबंध में 26 जून को शिकायत भेजी गई, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया।

वहीं, सरकारी वकील ने कोर्ट में जानकारी दी कि अधिकारी जांच कर रहे हैं। करीब 75 संस्थानों को नोटिस दिए जा चुके हैं। 35 को बंद किया गया है। 25 को सील कर किया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि ओल्ड राजेंद्र नगर में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था नहीं है। पुलिस की मिलीभगत से अनधिकृत निर्माण होते हैं। अनाधिकृत निर्माण इसके बिना नहीं हो सकते। सभी अधिकारी केवल जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने में रुचि रखते हैं। 

कोर्ट ने पूछा कि उस इलाके में कैसे इतना पानी जमा हो गया? जब अफसरों ने इमारत को अधिकृत किया तो क्या उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी? कोर्ट ने कहा कि एमसीडी के वरिष्ठ अफसर अपने एसी कार्यालयों से बाहर नहीं निकल रहे हैं, अगर ये नालियां ढकी थीं तो फिर ढक्कन क्यों नहीं हटाए?
 
कोर्ट ने कहा कि आज अगर आप MCD अफसर से नालियों की योजना बनाने के लिए कह दें तो वो ऐसा नहीं कर पाएंगे। अधिकारियों को यह नहीं पता कि नालियां कहां हैं, सब कुछ मिलाजुला है। कोर्ट ने कहा कि हमने कार्रवाई के बाद अब तक MCD में किसी को भी अपनी नौकरी से जाते नहीं देखा है। इमारतें ध्वस्त हो रही हैं, लेकिन क्या एमसीडी में इसके कारण किसकी नौकरी गई है?
 
एमसीडी ने आपने सबसे जूनियर अधिकारी को सस्पेंड कर दिया, लेकिन उस वरिष्ठ अधिकारी का क्या, जिसने निगरानी का अपना काम नहीं किया है? कभी-कभी वरिष्ठ अधिकारियों को भी आना पड़ता है और कबूल करना पड़ता है। लेकिन वो अपने एसी दफ्तरों से बाहर नहीं निकलते। हाईकोर्ट ने नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने ड्रेनेज सिस्टम को लेकर भी सवाल उठाए, कहा कि दिल्ली की आबादी 3:30 करोड़ के करीब हो चुकी है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है।

मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने एमसीडी आयुक्त को व्यक्तिगत तौर पर बृहस्पतिवार को होने वाली सुनवाई पर पेश होने का आदेश दिया। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को भी मामले में प्रतिवादी बनाने का आदेश दिया।

Asmita Sarkar

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