Edinbox Hindi

प्राचार्यों की नियुक्ति में गड़बड़ी का आरोप; पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी के कुलपति को नोटिस, पावर भी सीज

बिहार के प्रतिष्ठित पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति आरके सिंह को राजभवन ने कारण बताओ नोटिस भेजा है। उन पर कॉलेजों में प्राचार्यों की नियुक्ति में गड़बड़ी का आरोप है। राज्यपाल ने उन्हें कोई भी नीतिगत फैसला लेने से भी रोक दिया है। वीसी डॉक्टर आरके सिंह को यह नोटिस तब जारी किया गया है जब विधानसभा के मानसून सत्र में इस मामले को उठाया गया। भाजपा विधायक अरुण कुमार सिन्हा ने आरोप लगाया था कि पटना हाईकोर्ट के आदेश और कानूनों को ताक पर रखकर, सीनियर प्रोफेसरों को नजरअंदाज करते हुए जूनियर प्रोफेसरों को प्रभारी प्रिंसिपल बनाया गया है। यह मामला एसडीएम कॉलेज (पुनपुन), रामकृष्ण द्वारका कॉलेज और बीडी कॉलेज (दोनों पटना) से जुड़ा है।

विधायक ने यह भी सवाल उठाया कि बीडी कॉलेज (पटना) के चार शिक्षक, जो गांव में प्रिंसिपल के पद पर हैं, वो सिटी अलाउंस कैसे ले रहे हैं? यह मामला शिक्षा विभाग को भेजा गया था। चूंकि मामला विश्वविद्यालय से जुड़ा है, इसलिए शिक्षा विभाग ने इसे राज्यपाल के पास भेज दिया। राज्यपाल सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं। इसके बाद राज्यपाल ने कुलपति को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के प्रमुख सचिव रॉबर्ट एल. चोंगथु के पत्र में लिखा है, ‘आपको 15 दिनों के भीतर कारण बताओ नोटिस का जवाब देना होगा। जब तक राजभवन आपके जवाब से संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक आप कोई भी नीतिगत फैसला नहीं ले सकते।’

आरके सिंह का कार्यकाल 16 जनवरी 2025 को समाप्त हो रहा है। रिटायर होने वाले कुलपति के पास अपने कार्यकाल के आखिरी तीन महीनों तक कोई भी नीतिगत फैसला लेने का अधिकार नहीं होता है। इसका मतलब है कि सामान्य परिस्थितियों में भी अक्टूबर के मध्य तक उनकी शक्तियां कम हो जातीं। हालांकि, कुलपति आरके सिंह ने कहा कि वो राजभवन को विस्तृत जवाब देंगे।

उन्होंने कहा, ‘जब तक मैं जवाब नहीं दे देता, मेरे लिए इस बारे में कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। कुलपति के पास काफी अधिकार होते हैं और मैंने विश्वविद्यालय को आगे ले जाने के लिए जो भी जरूरी था, किया है। मैंने सभी कानूनों और नियमों का पालन किया है।’

उल्लेखनीय है कि बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम 1976 में यह साफ-साफ प्रावधान है कि स्थाई प्रिंसिपल की गैर मौजूदगी में जो सीनियर मोस्ट प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर होते हैं उन्हें प्रभारी प्रिंसिपल बनाया जाता है। आरोप लगाया गया है कि कुलपति कार्यालय द्वारा पैसे के लेनदेन के आधार पर जूनियर को प्रिंसिपल का प्रभार दे दिया गया।

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed