
उत्तर प्रदेश का दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (डीडीयू) फिर विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय की कुलपति पर एक ख़ास राजनीतिक दल की विचारधारा का समर्थन और उसके पक्ष में काम करने का आरोप लगा है। आरोप कांग्रेस की तरफ से लगाया गया है और इसके खिलाफ सड़क पर उतरकर आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है। कहा गया है कि कुलपति द्वारा शिक्षण संस्थान और सके संसाधनों का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है, जो घोर निंदनीय है।
दरअसल,उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष व राज्य सरकार के पूर्व मंत्री अजय राय ने दीनदयाल उपाध्यक्ष गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर पूनम टंडन पर वहां क्रीड़ा संकुल (मुख्य मैदान) पर हो रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन के निमित्त भूमि पूजन समारोह का निमंत्रण पत्र बांटने और विश्वविद्यालय शिक्षकों को इसमें आने के लिए बाध्य करने का आरोप लगाया है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कांग्रेस की ओर से जारी एक बयान में कहा कि ”शिक्षण संस्थानों के संघीकरण की कोशिश की जा रही है, जिसकी हम घोर भर्त्सना करते हैं।” उन्होंने कहा कि ”आम छात्रों की शिक्षा एवं उनके विकास का पैसा संघ के विचारों को बढ़ाने एवं उसके अनुषांगिक संगठन अभाविप को मजबूत करने में खर्च किया जा रहा है, जो निंदनीय है। यह घृणित कार्य विश्वविद्यालय की कुलपति द्वारा सिर्फ सरकार की चाटुकारिता एवं पद पर बने रहने की लालसा की वजह से किया जा रहा है।”
कांग्रेस ने कुलपति द्वारा किये जा रहे इस निंदनीय कार्य की सख्त आलोचना की है एवं महामहिम राज्यपाल महोदय से पूर्वाग्रह से ग्रस्त कुलपति के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है।
वहीं, कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने इन आरोपों को ‘झूठ और निराधार’ करार देकर खारिज किया है और कहा है कि ‘मैं कार्यक्रम की मेजबान नहीं हूं और न ही मैंने निमंत्रण पत्र बांटे हैं।”
उन्होंने कहा, ‘मुझे कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था और मुझे आज के कार्यक्रम (स्थल का भूमि पूजन) में भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन मैं पूर्व प्रतिबद्धताओं के कारण इसमें शामिल नहीं हो सकी।’ प्रो. टंडन ने कहा कि ”कार्यक्रम के आयोजन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।”
गोरखपुर कांग्रेस की जिला अध्यक्ष निर्मला पासवान ने भी कथित संलिप्तता की आलोचना करते हुए कहा, ‘भाजपा सरकार अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासकों का इस्तेमाल कर रही है, जो शर्मनाक है। किसी राजनीतिक समूह का खुलेआम समर्थन करना कुलपति कार्यालय की ईमानदारी और निष्पक्षता से समझौता करना है।’




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