
लोकसभा की कार्यवाही का भाषा रूपांतरण अब और विस्तृत होने जा रहा है। पहले जहां यह रूपांतरण हिंदी, अंग्रेजी, और 10 क्षेत्रीय भाषाओं में होता था, वहीं अब इसमें छह नई भाषाएं जोड़ी जाएंगी। इनमें बोडो, डोगरी, मैथिली, मणिपुरी, संस्कृत और उर्दू शामिल हैं। यह कदम भारत की संसद को एक नई पहचान देने की दिशा में उठाया गया है, जिससे भारतीय भाषाओं को सम्मान देने का संदेश दिया जा रहा है।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए, डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने संस्कृत में कार्यवाही के रूपांतरण पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में सिर्फ 73,000 लोग ही संस्कृत बोलते हैं, तो फिर taxpayers (करदाताओं) के पैसे का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है? उन्होंने इसे “अनावश्यक खर्च” करार दिया और सवाल उठाया कि क्या यह खर्च न्यायसंगत है।
दयानिधि मारन की इस आपत्ति पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ा जवाब दिया। बिरला ने कहा, “आप किस देश में रह रहे हैं? भारत की मूल भाषा संस्कृत रही है।” उन्होंने कहा कि संस्कृत पर आपत्ति क्यों जताई जा रही है, जबकि देश में 22 भाषाओं में कार्यवाही का रूपांतरण हो रहा है। इस तरह के विचारों को खारिज करते हुए स्पीकर ने कहा कि यह कदम भारत की विविधता को सम्मान देने का है, और लोकसभा की कार्यवाही में अब सभी भारतीय भाषाओं का समावेश किया जा रहा है।
ओम बिरला ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि दुनिया में कोई अन्य संसद ऐसी नहीं है, जहां इतनी सारी भाषाओं में एक साथ कार्यवाही का रूपांतरण हो रहा हो। भारत की संसद ने यह कदम भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार और सशक्तिकरण के लिए उठाया है।
यह कदम भारतीय भाषाओं को संसद में समान दर्जा देने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, जो भारतीय संस्कृति और भाषा की विविधता को प्रोत्साहित करेगा।




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