
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का मानना है कि जीवन में लक्ष्य, दिशा और दृष्टिकोण तय होने चाहिए। उनका कहना है कि जितना विशाल दृष्टिकोण और विचार होगा, उतना ही व्यक्ति बड़ा बनेगा। हर व्यक्ति के जीवन में चुनौतियां आती हैं, लेकिन जिसने धैर्य से काम लिया, वह हमेशा आगे बढ़ता चला गया है। ओम बिरला ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति लालटेन में पढ़कर भी देश का बड़ा व्यक्ति बन सकता है, वहीं एक व्यक्ति महलों में रहकर भी बड़ा नहीं बन सकता।
ओम बिरला यह बातें श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के बिजनेस कॉन्क्लेव 2025 में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कह रहे थे। यह तीन दिवसीय कॉन्क्लेव एसआरसीसी छात्र यूनियन द्वारा आयोजित किया गया था।
लोकसभा अध्यक्ष ने छात्रों से सवाल किया कि आखिर पढ़ाई क्या देती है और शिक्षा में पास होने के बाद क्या प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि बीबीए और बीकॉम में उत्तीर्ण होना कोई बड़ा लक्ष्य नहीं है। सिर्फ परीक्षा में पास होकर आगे बढ़ना एक संकुचित दृष्टिकोण है। यह समय जीवन के व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने का है। परिवर्तन जीवन में होना चाहिए, और यह बदलाव हर व्यक्ति, हर क्षण और हर समय हो सकता है।
ओम बिरला ने लोकतंत्र के महत्व को रेखांकित करते हुए छात्रों को लोकतंत्र के मंदिर में आने के लिए भी आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि तानाशाही कभी आगे नहीं बढ़ी है, जबकि लोकतंत्र की ताकत किसी भी देश को प्रगति की ओर ले जाती है। उन्होंने भारत के लोकतंत्र को उसकी सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा कि यही लोकतंत्र हमारे देश के भविष्य के लिए भी आवश्यक है।
एसआरसीसी की उप प्रधानाचार्य डॉ. अरुणा झा ने कहा कि यह संस्थान 100 साल पूरे कर रहा है और इन छात्रों में से कोई ऐसा निकलेगा जो बदलाव, नवाचार और नेतृत्व में योगदान करेगा, जिससे भारत समृद्ध और विकसित बनेगा।
ओम बिरला ने छात्रों को बताया कि जीवन में सकारात्मक दिशा की ओर जिद्द होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “यह सामर्थ्य और आत्मविश्वास जीवन में हर व्यक्ति के अंदर होना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है, वही बदलाव लाता है। जिद जीवन में बड़ा परिवर्तन लाती है, लेकिन यह जिद सकारात्मक दिशा में होनी चाहिए।”
उन्होंने शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि शिक्षा हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है और आध्यात्मिक ज्ञान आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है।
ओम बिरला ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए छात्रों को बताया कि उन्हें बचपन से ही राजनीतिक और सामाजिक जीवन में रुचि थी। वे आठवीं कक्षा में स्कूल के अध्यक्ष थे। उस समय जब लोग साइंस और गणित लेते थे, तो माहौल अलग होता था, लेकिन उन्होंने अपनी दिशा तय कर रखी थी कि उन्हें सामाजिक-राजनीतिक जीवन में जाना है। उनका कॅरिअर बनाने का कोई शौक नहीं था; वे बस पढ़ाई में पास होना चाहते थे। कॉलेज के पहले वर्ष में वे महासचिव बने, लेकिन दूसरे वर्ष में एक वोट से चुनाव हार गए।




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