
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की याचिका को खारिज करते हुए दो दोषियों को ऑनलाइन एलएलबी की पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी। शुक्रवार को न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि बीसीआई का काम कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना नहीं है। अदालत ने कहा कि यह जिम्मेदारी कानूनविदों और शिक्षाविदों की होनी चाहिए।
बीसीआई को कानूनी शिक्षा में हस्तक्षेप से रोका
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने बीसीआई को फटकार लगाते हुए कहा, “बीसीआई का कार्य कानूनी शिक्षा में हस्तक्षेप करना नहीं है। इसे कानूनविदों और विधि शिक्षकों पर छोड़ देना चाहिए। कृपया इस देश की कानूनी शिक्षा पर दया करें।”
बीसीआई के वकील ने दलील दी कि असल मुद्दा यह है कि दोषियों को वर्चुअल मोड में कक्षाएं लेने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, क्योंकि यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के विपरीत हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: प्रगतिशील आदेशों का समर्थन करें
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सवाल उठाया कि अगर उच्च अदालतें बाद में इन दोषियों को बरी कर देती हैं तो फिर क्या होगा? अदालत ने कहा कि “बीसीआई को इस तरह के प्रगतिशील आदेश का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे समर्थन देना चाहिए। उसे रूढ़िवादी और पारंपरिक दृष्टिकोण से बचना चाहिए।”
बीसीआई के वकील ने यह भी कहा कि वे केरल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल इस मामले में कानून से जुड़े व्यापक मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई की याचिका को खारिज करते हुए केरल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि इस विशेष मामले को ध्यान में रखते हुए दोषियों को ऑनलाइन मोड में एलएलबी की पढ़ाई करने की अनुमति दी जाती है।




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