
जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) ने अपनी पीएचडी प्रवेश नीति में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया है, जिसके तहत अब 50% मुस्लिम आरक्षण अनिवार्य के बजाय वैकल्पिक कर दिया गया है। इस बदलाव को लेकर विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक कोटे के कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है।
यह संशोधन 12 नवंबर, 2024 को जारी एक अधिसूचना के माध्यम से किया गया, जिसमें पीएचडी प्रवेश के अध्यादेश 9 (IX) को संशोधित किया गया है। पहले इस अध्यादेश में “करेगा” शब्द का उपयोग किया गया था, जिसे अब “कर सकता है” में बदल दिया गया है। अब विश्वविद्यालय को आरक्षण लागू करने का विवेकाधिकार प्राप्त हो गया है, जिससे नीति में लचीलापन आ गया है।
संशोधित नीति के तहत, विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर यह स्पष्ट किया गया है कि “पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश देते समय, संकाय/विभाग/केंद्र प्रवेश के लिए अपनाई गई जेएमआई आरक्षण नीति पर उचित ध्यान दे सकते हैं।” पहले की नीति में यह स्पष्ट था कि “50 प्रतिशत सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होंगी।”
कुलपति प्रोफेसर मजहर आसिफ की अध्यक्षता में इस संशोधन को अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद से मंजूरी प्राप्त हुई, और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिजवी ने अधिसूचना पर हस्ताक्षर किए।
एआईएसए का विरोध
इस संशोधन को लेकर छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने विरोध जताया है, और इसे “मुस्लिम छात्रों के अधिकारों पर जानबूझकर किया गया हमला” बताया। एआईएसए ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “संवैधानिक रूप से संरक्षित अल्पसंख्यक संस्थान जामिया मिलिया इस्लामिया मुस्लिम छात्रों के लिए अपनी 50% सीटें आरक्षित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। हालांकि, हालिया संशोधन ने आरक्षण को वैकल्पिक बनाकर जानबूझकर इस नीति को कमजोर कर दिया है।”
एआईएसए ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन मुस्लिम उम्मीदवारों को बहिष्कृत करने के लिए जानबूझकर सीटें खाली छोड़ रहा है। संगठन ने उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसमें शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में अंग्रेजी विभाग में 17 खाली सीटें हैं, जबकि केवल 12 मुस्लिम छात्रों को प्रवेश दिया गया। इसी तरह, समाजशास्त्र और अन्य विभागों में भी खाली सीटों का मुद्दा उठाया गया।
मुस्लिम छात्रों के लिए सुधार की मांग
एआईएसए ने संशोधन को रद्द करने और मुस्लिम आरक्षण नीति को बहाल करने की मांग की है। संगठन ने प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाया है और मुस्लिम उम्मीदवारों के खिलाफ स्वतंत्र जांच की भी मांग की है। एआईएसए ने कहा कि वह इस संस्थागत बहिष्कार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे, जब तक न्याय नहीं मिल जाता।




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