
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में पीएचडी प्रवेश से वंचित किए जाने के बाद एक दलित छात्र, शिवम सोनकर, पिछले 14 दिनों से कुलपति के आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहा है।
छात्र का दावा: आरक्षित सीटों को लेकर भेदभाव
शिवम सोनकर के अनुसार, शांति एवं संघर्ष अध्ययन विभाग ने छह पीएचडी सीटों की घोषणा की थी—तीन जेआरएफ उम्मीदवारों के लिए और तीन प्रवेश परीक्षा के माध्यम से भरने के लिए। उन्होंने प्रवेश परीक्षा के आधार पर आवेदन किया और दूसरा स्थान प्राप्त किया।
हालांकि, प्रवेश परीक्षा के तहत अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए कोई आरक्षित सीट नहीं थी। परिणामस्वरूप, तीन सीटें सामान्य और ओबीसी उम्मीदवारों को आवंटित कर दी गईं, जिससे वह प्रवेश से वंचित रह गए।
इसके अलावा, विभाग जेआरएफ श्रेणी की तीन सीटों को भरने में असफल रहा, जबकि उसने पहले इन्हें उपलब्ध बताया था। सोनकर ने तर्क दिया कि विश्वविद्यालय के पास खाली सीटों को अन्य श्रेणियों में आवंटित करने का अधिकार था, लेकिन उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया।
प्रशासन का जवाब: नियमों के तहत प्रवेश असंभव
सोनकर ने 21 मार्च को परिणाम घोषित होने के अगले दिन धरना शुरू किया। कार्यवाहक कुलपति प्रो. संजय कुमार ने 3 अप्रैल को उन्हें आश्वासन दिया कि उनके प्रवेश अनुरोध पर पुनर्विचार किया जाएगा।
हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि प्रवेश परीक्षा के तहत केवल दो सीटें थीं—एक सामान्य और एक ओबीसी श्रेणी के लिए, जो पहले ही भरी जा चुकी थीं।
प्रशासन ने यह भी कहा कि सोनकर जेआरएफ की खाली सीटों को प्रवेश परीक्षा सीटों में बदलने की मांग कर रहे हैं, लेकिन पीएचडी नियमों के अनुसार ऐसा रूपांतरण संभव नहीं है। इसलिए, उनकी रैंक के आधार पर उन्हें प्रवेश नहीं दिया जा सका।
छात्र का संकल्प: प्रवेश मिलने तक जारी रहेगा प्रदर्शन
शिवम सोनकर ने साफ किया है कि जब तक विश्वविद्यालय उन्हें पीएचडी में प्रवेश नहीं देता, तब तक उनका विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। वहीं, विश्वविद्यालय का कहना है कि नियमों के तहत वे कोई बदलाव नहीं कर सकते। यह विवाद अब शैक्षणिक अवसरों में समानता और आरक्षण नीति के पालन को लेकर गंभीर बहस का रूप लेता जा रहा है।




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