
दिल्ली-एनसीआर के कई प्रतिष्ठित निजी स्कूलों पर आरोप है कि वे शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 का उल्लंघन करते हुए कक्षा 6 और 7 के छात्रों को अगली कक्षा में प्रमोट नहीं कर रहे हैं। शिक्षा कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने दावा किया है कि इन स्कूलों ने छात्रों को या तो स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र लेने के लिए मजबूर किया है या फिर उन्हें एक ही कक्षा दोबारा पढ़ने का विकल्प दिया है।
क्या कहता है कानून?
शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने दिसंबर 2024 में ‘कुछ मामलों में परीक्षा और रोक’ से संबंधित नियमों को अधिसूचित किया था। संशोधित नियमों के अनुसार, स्कूल केवल कक्षा 5 और 8 में ही छात्रों को रोक सकते हैं, वह भी तभी जब दोबारा परीक्षा (रिजल्ट घोषित होने के दो महीने के भीतर) के बाद छात्र प्रमोशन के योग्य न हो।
इससे पहले RTE अधिनियम के तहत यह व्यवस्था थी कि कक्षा 8 तक किसी भी छात्र को फेल नहीं किया जा सकता। लेकिन 2019 में संशोधन के बाद राज्यों को 5वीं और 8वीं कक्षा में छात्रों को रोकने की अनुमति दी गई, यदि वे दो अवसरों में भी आवश्यक योग्यता प्राप्त नहीं कर पाएं।
शिकायतें और प्रतिक्रिया
गुड़गांव के एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मेरे बेटे की तबीयत खराब होने के कारण वह कक्षा 6 में अच्छे अंक नहीं ला सका। अब स्कूल कह रहा है कि यदि वह मई में होने वाली दोबारा परीक्षा में पास नहीं होता, तो उसे अगली कक्षा में प्रमोट नहीं किया जाएगा। जबकि नियमों के मुताबिक ऐसा केवल 5वीं और 8वीं कक्षा में ही संभव है।”
प्रख्यात अधिवक्ता और शिक्षा कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अगर कोई स्कूल कक्षा 6 या 7 में छात्रों को रोकता है, तो यह स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन है।”
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अनीता रामपाल ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों को रोकना न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों का भी हनन है। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि वे नजदीकी जिला या सत्र न्यायालय में इसकी शिकायत दर्ज कराएं।
CBSE के पूर्व अध्यक्ष की टिप्पणी
सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली ने कहा कि न तो RTE अधिनियम, न ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति और न ही राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा किसी भी स्कूल को कक्षा 6 या 7 में छात्र को रोकने की अनुमति देती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कक्षा 5 और 8 में रोकने के लिए भी राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने थे, जो अधिकांश राज्यों द्वारा अभी तक नहीं किया गया है।
क्या कहती है आरटीई अधिनियम की धारा 16ए?
धारा 16ए के अनुसार, हर शैक्षणिक वर्ष के अंत में कक्षा 5 और 8 में नियमित परीक्षा होगी। यदि कोई छात्र असफल होता है, तो उसे दो महीने के भीतर दोबारा परीक्षा का अवसर मिलेगा। यदि वह दोबारा भी पास नहीं हो पाता, तभी उसे उसी कक्षा में रोका जा सकता है। इसके अलावा, अधिनियम यह भी स्पष्ट करता है कि किसी भी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले स्कूल से निष्कासित नहीं किया जा सकता।
एक ही कक्षा दोहराने के दुष्परिणाम
शिक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, एक ही कक्षा को दोहराना बच्चे के लिए मानसिक रूप से हतोत्साहित करने वाला होता है। ऐसा करने से बच्चे को न तो अतिरिक्त संसाधन मिलते हैं और न ही वह उस कक्षा के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो पाता है। इससे उसका आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है और सामाजिक रूप से उसे ‘असफल’ मान लिया जाता है।
संशोधन के बाद राज्यों की स्थिति
2019 में संशोधन के बाद अब तक असम, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली सहित कम से कम 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 5वीं और 8वीं कक्षा में रोकने की नीति को लागू किया है। हालांकि, अधिसूचना में देरी और स्पष्ट दिशानिर्देशों की कमी के चलते कई स्कूल इसका गलत फायदा उठा रहे हैं।




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