
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हालिया छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल करने वाले सभी उम्मीदवार समाज के विभिन्न हाशिए पर रहने वाले वर्गों से आते हैं। कोई किसान का बेटा है, कोई मजदूर की बेटी, कोई अनुसूचित जाति से, तो कोई जनजातीय पृष्ठभूमि से—लेकिन सबमें एक बात समान है: उन्होंने छात्र अधिकारों की आवाज बुलंद की है। इस बार के चुनाव में आइसा-डीएसएफ गठबंधन ने तीन शीर्ष पदों पर कब्जा जमाया, जबकि एबीवीपी को एक पद मिला।
नीतीश कुमार: भूख हड़ताल से निकला छात्र नेता
छात्र संघ अध्यक्ष बने नीतीश कुमार बिहार के अररिया जिले के शेखपुरा गांव से हैं। ओबीसी वर्ग से आने वाले नीतीश के पिता किसान हैं और मां गृहिणी। उन्होंने बीएचयू से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और 2020 में JNU के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज़ में एमए में दाखिला लिया।
नीतीश ने कोरोना काल में विश्वविद्यालय को खोलने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया और 2023 में छात्रावास समेत अन्य मुद्दों को लेकर 16 दिनों की भूख हड़ताल करके छात्रों के बीच पहचान बनाई। वह आइसा की जेएनयू इकाई के सचिव और स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के काउंसलर भी रह चुके हैं।
मनीषा: मजदूर की बेटी से उपाध्यक्ष तक का सफर
उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज करने वाली मनीषा हरियाणा के एक अनुसूचित जाति और मजदूर वर्ग से आती हैं। उनके पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे। मनीषा JNU के ईस्ट एशियन स्टडीज़ में पीएचडी कर रही हैं। कैंपस में प्रवेश के बाद उन्होंने अपने व्यक्तिगत संघर्ष को एक व्यापक सामाजिक आंदोलन में बदल दिया। 2019 में SIS काउंसलर चुनी गईं और फीस वृद्धि के खिलाफ मुखर आंदोलन किया।
मुंतेहा फातिमा: ओबीसी मुस्लिम परिवार से सचिव पद तक
सचिव पद पर चुनी गईं मुंतेहा फातिमा पटना की रहने वाली हैं और एक ओबीसी मुस्लिम परिवार से आती हैं। वे JNU के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के वेस्ट एशियन स्टडीज़ केंद्र में पीएचडी कर रही हैं। 2023-24 में वह गंगा हॉस्टल की अध्यक्ष भी रही हैं और हमेशा छात्र हितों के लिए मुखर रही हैं।
वैभव मोणा: जनजातीय पृष्ठभूमि से संयुक्त सचिव तक
संयुक्त सचिव बने वैभव मोणा राजस्थान के करौली जिले से हैं और एक जनजातीय किसान परिवार से आते हैं। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। वर्तमान में JNU के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी साहित्य पर शोध कर रहे हैं और जूनियर रिसर्च फेलो हैं।
इन छात्रों की जीत न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्षों की कहानी है, बल्कि यह दर्शाती है कि विश्वविद्यालय राजनीति में सामाजिक न्याय, भागीदारी और जमीनी मुद्दों की कितनी गूंज है।




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