
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शैक्षणिक सत्र 2025-26 से स्नातक स्तर पर अप्रेंटिसशिप को अनिवार्य किया जा रहा है। इसका उद्देश्य छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही उद्योगों से जोड़ना और उन्हें रोजगार योग्य बनाना है।
अप्रेंटिसशिप के तहत छात्रों को इंडस्ट्री के अनुसार व्यावसायिक प्रशिक्षण मिलेगा। तीन वर्षीय डिग्री कार्यक्रम में 1 से 3 सेमेस्टर तक और चार वर्षीय डिग्री में 2 से 4 सेमेस्टर तक अप्रेंटिसशिप शामिल होगी। इस दौरान छात्रों को कुल 10 क्रेडिट भी प्रदान किए जाएंगे।
UGC ने तैयार की गाइडलाइन
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की एक उच्चस्तरीय समिति ने अप्रेंटिसशिप के लिए दिशानिर्देश तैयार किए हैं। इन गाइडलाइनों के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों, उद्योगों और छात्रों के बीच त्रिपक्षीय समझौता किया जाएगा, जिसमें तीनों पक्षों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय होंगी।
संस्थान अपनी क्षमता और उद्योगों में उपलब्ध संसाधनों के अनुसार अप्रेंटिसशिप की सीटें तय कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें ‘नेशनल अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग स्कीम (NATS)’ पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा। यदि संस्थान AEDEP (Apprenticeship Embedded Degree Programme) के अंतर्गत इंडस्ट्री के साथ कार्यक्रम संचालित करते हैं, तो उद्योग की ओर से स्टाइपेंड दिया जाएगा। वहीं, NATS पोर्टल पर पंजीकरण करने पर केंद्र सरकार की ओर से स्टाइपेंड मिलेगा।
मार्कशीट पर दर्ज होगी जानकारी
छात्रों की मार्कशीट में यह जानकारी दी जाएगी कि उन्होंने अप्रेंटिसशिप कहां से की, इसमें कितने क्रेडिट मिले, और किस अवधि में प्रशिक्षण लिया। इससे उनके कौशल का प्रमाण भी स्पष्ट रूप से मिलेगा।
नौकरी का फॉलोअप अनिवार्य
अप्रेंटिसशिप पूर्ण होने के बाद छात्रों की एक ट्रेनिंग रिपोर्ट तैयार की जाएगी। संबंधित कॉलेज को यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्र को नौकरी मिली या नहीं। इसके लिए एक वर्ष तक प्रति छात्र एक कर्मचारी नियुक्त रहेगा जो फॉलोअप करेगा और यह जांचेगा कि छात्र को रोजगार क्यों नहीं मिला, अगर नहीं मिला तो उसके क्या कारण रहे।




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