
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को बड़ा झटका देते हुए 1158 असिस्टेंट प्रोफेसर और लाइब्रेरियन की नियुक्तियों को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह मनमानी थी और इसमें नियम-कायदों की खुलकर अनदेखी की गई। साथ ही कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा सितंबर 2024 में दिए गए उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें इन नियुक्तियों को सही ठहराया गया था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार इन नियुक्तियों को जायज ठहराने के लिए कोई भी वैध कारण पेश नहीं कर पाई। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह यूजीसी (UGC) के नियमों के अनुसार नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करे।
मामला क्या है?
2021 में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इन भर्तियों को नियमों के उल्लंघन के चलते रद्द कर दिया था। उस समय तक सरकार ने 609 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दे दिए थे, लेकिन सिर्फ 135 को ही पोस्टिंग और वेतन मिल रहा था। इसके खिलाफ डिवीजन बेंच ने दखल देते हुए सिंगल बेंच का आदेश रद्द कर दिया और बाकी आवेदकों की नियुक्तियों पर रोक हटा दी थी।
सरकार का पक्ष और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
पंजाब सरकार ने कोर्ट में दलील दी थी कि सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है, इसलिए बचे हुए उम्मीदवारों को स्टेशन अलॉट करने की अनुमति दी जाए। हाईकोर्ट ने यह मांग मानते हुए सभी नियुक्तियों को वैध ठहरा दिया था। हालांकि, इस फैसले को याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को अवैध ठहराते हुए पंजाब सरकार को नये सिरे से और यूजीसी के मापदंडों के अनुरूप पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।
यह फैसला न केवल राज्य सरकार की नियुक्ति प्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि शैक्षणिक संस्थानों में भर्ती के दौरान नियमों की अनदेखी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।




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