
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 8 के लिए सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक “समाज की खोज: भारत और उससे आगे” इस सप्ताह प्रकाशित की है। यह पुस्तक नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के तहत पहली किताब है, जो इतिहास के कई ऐसे पक्षों को सामने लाती है जिन्हें अब तक पारंपरिक पाठ्यपुस्तकों में कम महत्व दिया गया था।
पुस्तक में सिख गुरुओं द्वारा मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध दिखाई गई बहादुरी, मराठों के उदय, ताराबाई और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महिला नेताओं के योगदान, और विभिन्न जनजातीय विद्रोहों को प्रमुखता से शामिल किया गया है।
अनदेखे नायकों और neglected इतिहास को मिला स्थान
किताब में रानी दुर्गावती, रानी अबक्का और त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा जैसे ऐतिहासिक पात्रों को भी विशेष स्थान दिया गया है। भारत की सांस्कृतिक ज्ञान परंपरा और पारंपरिक कौशलों पर भी एक अलग खंड शामिल किया गया है, जिससे छात्रों को भारत की विविध ऐतिहासिक धरोहर की व्यापक समझ मिल सके।
प्रस्तावना में “इतिहास के कुछ अंधकारमय कालखंडों पर टिप्पणी” शीर्षक से एक अनुभाग है, जिसमें छात्रों को यह समझाने का प्रयास किया गया है कि इतिहास में युद्ध, सत्ता संघर्ष और रक्तपात जैसे विषयों को कैसे संवेदनशील दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए। उसमें स्पष्ट कहा गया है, “आज किसी को भी अतीत की घटनाओं के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।”
13वीं से 17वीं सदी का पुनर्पाठ
“भारत के राजनीतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण” नामक अध्याय में 13वीं से 17वीं सदी तक भारत में हुए राजनीतिक परिवर्तनों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें दिल्ली सल्तनत की स्थापना, उसके विरोध, विजयनगर और बहमनी जैसे राज्यों, मुगल शासन तथा उसके खिलाफ हुए प्रतिरोधों और सिखों के उदय को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
मुगल शासकों के वर्णन में विशेष दृष्टिकोण लिया गया है:
– बाबर को “निर्दयी और क्रूर विजेता” बताया गया है जिसने “कई शहरों की पूरी आबादी का कत्लेआम किया।”
– औरंगज़ेब को “सैन्य शासक” कहा गया है जिसने “मंदिरों और गुरुद्वारों को ध्वस्त किया।”
– अकबर को “क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण” बताया गया है, और कहा गया है कि “गैर-मुस्लिमों को प्रशासन में सीमित स्थान मिला।”
– चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के बाद “करीब 30,000 लोगों के नरसंहार” का भी उल्लेख किया गया है।
पुस्तक में यह भी स्वीकार किया गया है कि “मुगल काल में धार्मिक असहिष्णुता की कई घटनाएं हुईं।”
सिख, मराठा और उपनिवेशकालीन संघर्षों पर विशेष फोकस
मराठों को केवल सैन्य शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि समुद्री क्षमताओं और प्रशासनिक सुधारों के लिए भी प्रस्तुत किया गया है। सिख गुरुओं के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा हेतु उनके योगदान को प्रमुखता से दिखाया गया है।
ब्रिटिश उपनिवेशकाल में हुए जन आंदोलनों — जैसे संन्यासी-फकीर आंदोलन, नील विद्रोह और 1857 की क्रांति — को भी नए दृष्टिकोण से शामिल किया गया है।
“इतिहास को समावेशी दृष्टिकोण से पढ़ाया जाएगा” — NCERT
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक समिति के एक सदस्य के अनुसार, “यह पुस्तक छात्रों को संघर्षों और समाज के विकास की एक अधिक समावेशी और संतुलित तस्वीर देगी — जो अब तक की एकरूपी ऐतिहासिक कथाओं से काफी अलग होगी।”




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