
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने अपने संबद्धता उप-नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए यह स्पष्ट किया है कि अब स्कूलों में चलने वाले सेक्शनों की अधिकतम संख्या उस स्कूल की बिल्ट-अप कारपेट एरिया यानी बनी हुई इमारत की उपयोगी जगह के आधार पर तय की जाएगी, न कि जमीन के कुल क्षेत्रफल के अनुसार।
CBSE सचिव हिमांशु गुप्ता के मुताबिक, बोर्ड को विभिन्न स्कूलों और अन्य हितधारकों से लगातार यह सुझाव मिल रहे थे कि शहरी और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जमीन की उपलब्धता कम होने के कारण स्कूलों को नए दाखिलों के दबाव में अतिरिक्त सेक्शन शुरू करने में कठिनाई होती है। पुराने नियमों में स्कूल की जमीन के आकार के आधार पर ही सेक्शन की सीमा तय की जाती थी, जिससे कई स्कूलों को दिक्कत हो रही थी।
नए नियम क्यों लाए गए?
गुप्ता ने बताया कि कई स्कूलों के लिए 1:40 के छात्र-सेक्शन अनुपात को बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है, जबकि प्रवेश की मांग लगातार बनी रहती है। इसे देखते हुए अब CBSE ने यह फैसला किया है कि स्कूलों में अधिकतम सेक्शन की संख्या स्कूल भवन की वास्तविक बिल्ट-अप कारपेट एरिया पर निर्भर करेगी।
इस क्षेत्रफल का सत्यापन स्थानीय प्रशासनिक निकाय या किसी अधिकृत आर्किटेक्ट से करवाना आवश्यक होगा। वहीं, अब जमीन के कुल क्षेत्रफल का उपयोग सिर्फ स्कूल की श्रेणी (जैसे ब्रांच स्कूल, मिडिल स्कूल, सेकेंडरी या सीनियर सेकेंडरी स्कूल) तय करने के लिए किया जाएगा।
क्या बदलेगा नए नियम से?
– अब सेकेंडरी (कक्षा 9-10) और सीनियर सेकेंडरी (कक्षा 11-12) दोनों स्तरों पर बराबर संख्या में सेक्शन की अनुमति मिलेगी।
– स्कूल में बालवाटिका से लेकर कक्षा 10/12 तक जितने भी सेक्शन संचालित हैं, उनकी कुल संख्या का एक-चौथाई हिस्सा अधिकतम सेक्शन की सीमा मानी जाएगी।
इस बदलाव से उन स्कूलों को काफी राहत मिलेगी जो सीमित भूमि पर बने हैं, लेकिन जिनके पास पर्याप्त बिल्ट-अप एरिया है। अब ऐसे स्कूल अपने भवन की वास्तविक क्षमता के अनुसार अधिक छात्रों को दाखिला दे सकेंगे।




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