
देश में तेजी से बढ़ते कपड़ा कचरे और पर्यावरण प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए आईआईटी दिल्ली ने जींस वेस्ट को रीसाइकल करने की नई तकनीक विकसित की है। टेक्सटाइल एवं फाइबर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार और प्रोफेसर बी.एस. बुटोला के नेतृत्व में शोधार्थी सत्या करमाकर और डॉ. राजीव भट्टाचार्य की टीम ने यह उपलब्धि हासिल की। इस तकनीक में पुराने जींस कपड़ों को फाइबर और फिर धागों में बदला गया और सीमलेस होल गारमेंट तकनीक से नए कपड़े तैयार किए गए। शोध में पाया गया कि सौ फीसदी रीसाइकल धागे से कपड़ा बनाना संभव नहीं क्योंकि उसकी मजबूती कम हो जाती है, लेकिन जब 50 प्रतिशत रीसाइकल और 50 प्रतिशत नए धागों को मिलाकर कपड़ा बुना गया तो उसकी क्वालिटी और लुक बिल्कुल नए कपड़े के बराबर पाया गया। इसके बाद कपड़े पर विशेष केमिकल और सॉफ्टनिंग ट्रीटमेंट किया गया जिससे उसकी मजबूती और मुलायमपन दोनों में सुधार आया।
विशेषज्ञों का कहना है कि कपड़े की क्वालिटी बढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा सिलिकॉन बेस्ड सॉफ्टनर का इस्तेमाल होता है, जो न तो पर्यावरण के लिए हानिकारक है और न ही उपभोक्ता के लिए। हालांकि इसका असर स्थायी नहीं होता और आमतौर पर 10 से 20 धुलाई तक बना रहता है। रिसर्च टीम ने बताया कि सीमलेस गारमेंट मशीन की मदद से केवल 4 से 5 पैकेज धागों में 60 से 90 मिनट में एक परिधान तैयार किया जा सकता है। धागा बनाने की प्रक्रिया में सीधे पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन कपड़े की डाईंग और प्री-ट्रीटमेंट के दौरान एक किलो कपड़े के लिए लगभग 200 लीटर पानी की खपत होती है।
आईआईटी दिल्ली की इस रिसर्च का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत हर साल करीब 7.8 मिलियन टन टेक्सटाइल वेस्ट पैदा करता है, जो वैश्विक कचरे का 8.5 प्रतिशत है। कपड़ा कचरा उत्पादन में भारत दुनिया के शीर्ष तीन देशों में शामिल है। वहीं, वैश्विक फैशन उद्योग पानी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। केवल एक जोड़ी जींस बनाने में करीब 3,781 लीटर पानी लगता है, जो किसी व्यक्ति के तीन साल तक पीने वाले पानी के बराबर है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तकनीक को अन्य कपड़ा अपशिष्टों पर भी लागू किया जा सकता है और इससे पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के साथ-साथ कपड़ा उद्योग को टिकाऊ बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।




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