
दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा वकीलों की भर्ती क्लैट-पीजी (कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट- स्नातकोत्तर) अंकों के आधार पर करने के फैसले पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि इस प्रक्रिया के पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने एनएचएआई की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश सुरक्षित रखा और तब तक भर्ती प्रक्रिया आगे न बढ़ाने का निर्देश दिया।
अदालत ने टिप्पणी की, “हम इसके औचित्य पर सवाल उठाते हैं। क्लैट-पीजी का उद्देश्य एलएलएम में प्रवेश है, न कि रोजगार का मूल्यांकन। आप कैसे मान सकते हैं कि इस परीक्षा से यह तय होगा कि कोई उम्मीदवार अच्छा कर्मचारी साबित होगा या नहीं?”
एनएचएआई के वकील ने तर्क दिया कि क्लैट अंकों से उम्मीदवार की कानूनी क्षमता का आकलन किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “यह एकमात्र उचित मानदंड है।” हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि रोजगार और उच्च शिक्षा, दोनों के लिए अलग-अलग कौशल की आवश्यकता होती है।
अदालत ने सवाल किया, “आप कैसे क्लैट-पीजी अंकों को पात्रता मानदंड बना सकते हैं? यह परीक्षा शिक्षा के लिए चयन का तरीका है, न कि रोजगार के लिए। आप अनुभव और अन्य क्षमताओं का आकलन क्यों नहीं कर रहे?”
एनएचएआई के वकील ने दलील दी कि अनुभव को भी चयन प्रक्रिया में महत्व दिया गया है और सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां भी यही पद्धति अपनाती हैं। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह पर्याप्त कारण नहीं है।
पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली (एनएलयू-Delhi) राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क में दूसरे स्थान पर है, फिर भी यह क्लैट-पीजी में शामिल नहीं है। अदालत ने सवाल किया कि ऐसी योग्यता को प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार एसोसिएशन के जरिए चयन कराने के पिछले सुझाव का भी जिक्र किया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि इस पर बार एसोसिएशन को जवाब देना होगा।
अंत में अदालत ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा, “जब तक आदेश नहीं दिया जाता, एनएचएआई अपने भर्ती विज्ञापन के तहत आगे कोई कार्यवाही नहीं करेगा।”




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