
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जिस तेज़ी से विकसित हो रहा है, उसने न सिर्फ टेक इंडस्ट्री बल्कि शिक्षा प्रणाली की नींव तक हिला दी है। गूगल की पहली जनरेटिव AI टीम के संस्थापक और इंटीग्रल AI के सीईओ जाद तारीफी का कहना है कि “AI इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि जब तक कोई व्यक्ति PhD पूरी करेगा, तब तक यह तकनीक ही नई हो चुकी होगी।”
PhD होगी ‘पुराने ज़माने की बात’
तारीफी खुद 2012 में PhD कर चुके हैं और उसे वे “पांच साल की मेहनत और दर्द” बताते हैं। उनका कहना है कि PhD अब केवल उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो इस क्षेत्र के प्रति गहरा जुनून रखते हैं।
उनके अनुसार, आज की रिसर्च और स्टडी प्रोग्राम इतनी तेज़ी से आउटडेट हो रहे हैं कि जब तक कोई छात्र अपनी पांच से सात साल की PhD पूरी करता है, तब तक उसका कोर्स और तकनीक दोनों बदल चुके होते हैं।
याददाश्त पर आधारित प्रोफेशन पर मंडराता खतरा
तारीफी का मानना है कि वे क्षेत्र जो मेमोराइजेशन (याददाश्त) पर निर्भर हैं—जैसे मेडिसिन, अब AI की वजह से धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो सकते हैं। उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे प्रोफेशन में है जो केवल याद करने पर आधारित है, तो AI जल्द ही उसकी जगह ले लेगा। वे छात्रों को सलाह देते हैं कि वे ऐसे क्षेत्रों की ओर बढ़ें जहां AI का उपयोग अभी शुरुआती चरणों में है, जैसे बायोलॉजी या बॉटनी।
अब डिग्री नहीं, स्किल्स और इमोशनल इंटेलिजेंस की अहमियत
तारीफी युवाओं को सलाह देते हैं कि वे औपचारिक डिग्रियों के बजाय प्रैक्टिकल स्किल्स और इमोशनल इंटेलिजेंस (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) विकसित करने पर ध्यान दें।
उनके अनुसार, यही क्षमताएं किसी व्यक्ति को तेजी से सीखने, बदलावों के साथ ढलने और नई तकनीक अपनाने की शक्ति देती हैं — जो आज की AI-प्रधान दुनिया में सबसे ज़रूरी है।




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