
एमएस धोनी। यानी महेन्द्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni)। भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे सफल कप्तान। इन दिनों उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित उनका गांव फिर चर्चा में है। और सुर्ख़ियों में है गांव के स्कूल की वजह से, जो बंद होते-होते रह गया। या कहें बंद होने से बचा लिया गया। मगर बचाने वाले धोनी नहीं, बल्कि तीन लड़कियां हैं। इन लड़कियों की वजह से ही धोनी के गांव का स्कूल अभी भी बचा है, संचालित हो रहा है।
गौरतलब है कि झारखण्ड के रांची शहर में निवास करने वाले महेन्द्र सिंह धोनी मूलरूप से उत्तराखंड से हैं। अल्मोड़ा के लमगड़ा ब्लॉक के ल्वाली गांव के। ये गांव दशकों से पलायन की पीड़ा झेलने को अभिशप्त है। 70 के दशक में इसी वजह से धोनी के पिता भी पलायन कर गए थे। इस उम्मीद और मकसद से कि कहीं कोई ऐसा ठौर मिले जहाँ पेट भी पले और बच्चों को भी बेहतर ढंग से पाल पाएं। यह अलग बात कि अपनी ज़मीन से उन्हें तब भी प्यार रहा, जब वह इसे छोड़ बाहर चले गए। वह हमेशा अपने गांव से जुड़े रहे, अक्सर यहाँ आते-जाते रहे।
बहरहाल, पलायन का दंश ल्वाली गांव आज भी झेल रहा है। लोग रोजी-रोज़गार के लिए यहाँ से कहीं और चले गए हैं। मौजूदा वक़्त में इस गांव में महज 23 परिवार रह गए हैं। और लोगों की तादाद कुलजमा 100 के करीब। और यही वजह है कि पढ़ने- लिखने वाले बच्चे भी अब यहाँ नहीं। इसकी वजह से यहाँ का स्कूल खाली-सा हो गया है। बच्चों के अभाव में इसके बंद होने की आशंका गहरा गयी थी। स्वाभाविक है कि जब स्कूल में बच्चे नहीं आएंगे, तो उसका संचालन क्योंकर हो ! लेकिन तीन बच्चियों की वजह से स्कूल बंद होने से बच गया।
दरअसल, सारे बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया मगर गांव का प्राइमरी स्कूल पूरी तरह बंद होने से बच गया क्योंकि मेनका बिष्ट, दीक्षा और खुशबू ने स्कूल नहीं छोड़ा। वे स्कूल आती रहीं। अपनी उम्मीदों के साथ उन्होंने इस स्कूल के अस्तित्व के लिए भी उम्मीदें ज़िंदा रखीं। 7 साल की मेनका और दीक्षा कक्षा दो की छात्राएं हैं, जबकि आठ वर्षीया खुशबू कक्षा तीन में पढ़ रही हैं। इनकी वजह से ही धोनी के गांव का स्कूल बंद होने से बच गया।
स्कूल के शिक्षक पुष्कर सिंह भी बताते हैं कि गांव में 2005 में स्कूल बना था। अब यह काफी जर्जर हो गया है। लिहाजा, खंड शिक्षाधिकारी की अनुमति से बीते अप्रैल माह से गांव के जन मिलन केन्द्र में कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है। अभी स्कूल में तीन छात्राएं हैं, जिनकी वजह से कक्षाएँ लग रही हैं। ये न होतीं तो स्कूल बंद ही हो जाता। शिक्षक पुष्कर सिंह कभी अवकाश में रहते हैं, तब दूसरे स्कूल के शिक्षक यहाँ बच्चियों को पढ़ाने आते हैं।
बता दें कि सरकारी स्कूल में छात्रों की काम तादाद की समस्या लगभग हर जगह देखने को मिलती है। यही वजह है कि कई स्कूल बंद कर दिए जाते हैं या उनका किसी अन्य स्कूल में विलय कर दिया जाता है। उत्तराखंड में भी 400 से ज़्यादा ऐसे स्कूल हैं जहाँ छात्रों की संख्या 10 से भी कम है।




Add comment