
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में AI से तैयार फर्जी या मनगढ़ंत कानूनी संदर्भों के उपयोग पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि बिना सत्यापन के AI से तैयार कानूनी मिसालों का इस्तेमाल न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है। इसी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने Essel Infraprojects Limited से जुड़े एक दिवाला मामले में राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की मुंबई पीठ का आदेश रद्द कर दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि NCLT के आदेश में जिन न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया था, उनमें से कुछ फैसले वास्तविक रूप से मौजूद ही नहीं थे। कुछ मामलों में काल्पनिक केस का उल्लेख किया गया, जबकि कुछ जगह असली मामलों के साथ गलत कानूनी संदर्भ जोड़ दिए गए थे।
फर्जी कानूनी मिसालें न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में अस्तित्वहीन या मनगढ़ंत फैसलों का उपयोग बेहद गंभीर मामला है।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि कानून में फर्जी कानूनी सामग्री को मिसाल के रूप में शामिल करना वैसा ही है जैसे किसी व्यवस्था में ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ जैसा जहरीला रसायन छोड़ देना। यह शुरुआत में दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ पूरी व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसे फर्जी संदर्भ न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, बल्कि निष्पक्ष निर्णय की मूल भावना को भी कमजोर करते हैं।
अदालतों के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को AI से तैयार कानूनी संदर्भों का बिना जांच-पड़ताल उपयोग करने के मामलों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी चाहिए।
अदालत के अनुसार, यदि कोई वकील बिना सत्यापन के AI से तैयार फर्जी निर्णयों का हवाला देता है, तो इसे पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जा सकता है। वहीं यदि कोई न्यायिक अधिकारी ऐसे संदर्भों पर भरोसा करते हुए फैसला देता है, तो यह भी गंभीर चूक मानी जाएगी।
पीठ ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में दिए गए आदेशों को आवश्यक होने पर रद्द किया जाना चाहिए।
BCI को विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India – BCI) को निर्देश दिया है कि वह एक विशेषज्ञ समिति गठित करे।
यह समिति इस बात पर सुझाव देगी कि यदि कोई अधिवक्ता अदालत में AI से तैयार फर्जी कानूनी मिसाल पेश करता है, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश भी तैयार किए जाएंगे।
किस मामले में आया यह फैसला?
यह मामला पूजा रमेश सिंह, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और Essel Infraprojects Limited से जुड़े दिवाला विवाद का है। अपीलकर्ता ने NCLT की मुंबई पीठ के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 7 के तहत आवेदन स्वीकार किया गया था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि NCLT के आदेश में जिन मामलों का हवाला दिया गया था, उनमें ICICI Bank Limited बनाम Urban Infrastructure Real Estate Limited (2019) और Sarabjit Singh बनाम Union Bank of India (2022) जैसे संदर्भ शामिल थे। जांच में स्पष्ट हुआ कि इन नामों से कोई वैध सुप्रीम कोर्ट का फैसला मौजूद नहीं है और ये कानूनी संदर्भ पूरी तरह काल्पनिक थे।
जम्मू-कश्मीर बैंक ने क्या कहा?
जम्मू-कश्मीर बैंक ने अपने हलफनामे में कहा कि उसके वकील ने इन फर्जी मामलों का हवाला नहीं दिया था। बैंक के अनुसार, NCLT ने अपने स्तर पर शोध के दौरान इन संदर्भों को आदेश में शामिल किया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलती चाहे किसी भी स्तर पर हुई हो, यदि न्यायिक आदेश में फर्जी कानूनी संदर्भ शामिल हो जाते हैं तो इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए ऐसे मामलों में सख्त सतर्कता और तथ्यात्मक जांच बेहद जरूरी है।
AI का इस्तेमाल करें, लेकिन सत्यापन के साथ
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब कानूनी शोध, दस्तावेज तैयार करने और ड्राफ्टिंग में AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि AI केवल एक सहायक तकनीक हो सकती है, लेकिन किसी भी कानूनी दस्तावेज या न्यायिक संदर्भ का उपयोग करने से पहले उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना अनिवार्य है। बिना सत्यापन के AI पर भरोसा करना न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।




Add comment