
रविवार की सुबह आईआईटी खड़गपुर के मदनमोहन मालवीय हॉल में एक कमरा ऐसा भी था, जिसका दरवाज़ा सुबह तक नहीं खुला। जब पुलिस पहुंची और दरवाज़ा तोड़ा गया, तो भीतर फांसी से लटका मिला मोहम्मद आसिफ कमर का शव—सिविल इंजीनियरिंग विभाग का तीसरे वर्ष का छात्र, जो बिहार के सिओहर जिले से आया था, सपनों की एक गठरी लेकर।
कमरे की दीवारें चुप थीं, जैसे किसी ने उन्हें बरसों से अपनी पीड़ा सुनाई हो। लेकिन वे बोल नहीं पाईं। आसिफ की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन अनकहे सवालों की गूंज है, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को उजागर करते हैं।
सपनों से बोझ तक का सफर
आईआईटी जैसे संस्थान में प्रवेश किसी भी युवा के लिए गर्व की बात होती है, लेकिन यह गर्व अक्सर उस दबाव के साथ आता है जिसे शब्दों में बांध पाना कठिन है। उत्कृष्टता की उम्मीद, सामाजिक अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा, अकेलापन—ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो बाहर से चमकीला दिखता है, लेकिन भीतर से भारी और असहाय कर देने वाला हो सकता है।
आसिफ अकेला नहीं था। 20 अप्रैल को चौथे वर्ष के छात्र अनिकेत वाकर ने भी आत्महत्या कर ली थी। उससे पहले जनवरी में शॉन मलिक और पिछले वर्ष जून में देविका पिल्लई ने भी यही रास्ता चुना। ये घटनाएं सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं हैं, बल्कि यह संकेत हैं कि हम अपने छात्रों की मानसिक स्थिति को समझने में लगातार चूक रहे हैं।
संस्थान की कोशिशें, पर क्या वे काफी हैं?
आईआईटी खड़गपुर प्रशासन ने छात्रों की सहायता के लिए कई पहलें शुरू की हैं—24 घंटे काउंसलर उपलब्ध हैं, दरवाजों पर बारकोड लगे हैं जिन्हें स्कैन कर तत्काल परामर्श लिया जा सकता है। कार्यवाहक निदेशक अमित पात्रा कहते हैं, “हमारे छात्र हमारे अपने बच्चे हैं।” एक समिति बनाई गई है जो इन घटनाओं के कारणों की जांच करेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या तकनीकी समाधान भावनात्मक समस्याओं को पूरी तरह हल कर सकते हैं? क्या इन पहलों तक पहुंचने से पहले ही छात्र टूट नहीं जाते?
खामोशी की संस्कृति
देश के टॉप संस्थानों में पढ़ रहे छात्र अक्सर अपनी कमज़ोरी या मानसिक तनाव को साझा करने से कतराते हैं। उन्हें डर होता है कि कोई उन्हें कमजोर न समझे, या यह मान न ले कि वे उस तेज़ रफ्तार दौड़ में पिछड़ रहे हैं, जहां थकने की इजाज़त नहीं।
हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी बहुत कम संवेदनशीलता है। परामर्श को एक विकल्प की तरह नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प की तरह देखा जाता है।
एक जरूरी आत्ममंथन
आसिफ की मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम केवल कामयाबी की इमारत बना रहे हैं, जिनकी नींव में हमारे युवाओं की भावनाएं दब रही हैं? क्या यह वक्त नहीं कि हम “इंडिया बनाम भारत” की बहसों से निकलकर अपने कॉलेजों, होस्टलों, और बच्चों के कमरों की दीवारों को सुनने की कोशिश करें?
क्योंकि जब एक छात्र चुपचाप चला जाता है, वह सिर्फ अपनी कहानी नहीं ले जाता—वह हमें हमारे समाज की खामोशियों का आईना दिखा जाता है।




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