ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय पुलिस अधिकारियों ने फिंगरप्रिंट यानी उंगलियों के निशान की पहचान करने और उन्हें व्यवस्थित करने की ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसने अपराध जांच के तरीके को बदल दिया। बंगाल पुलिस के दो भारतीय अधिकारियों, अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस, ने फिंगरप्रिंट को वर्गीकृत करने की एक ऐसी प्रणाली विकसित करने में योगदान दिया, जिससे पुलिस के लिए हजारों निशानों के बीच किसी खास व्यक्ति के निशान को खोजना आसान हो गया। हालांकि, इस काम से जुड़े ब्रिटिश अधिकारी का नाम इतिहास में अधिक चर्चित हुआ, जबकि इन भारतीय अधिकारियों को लंबे समय तक अपेक्षित पहचान नहीं मिली।
आज फिंगरप्रिंट तकनीक का इस्तेमाल अपराध स्थल से मिले निशानों के आधार पर संदिग्धों की पहचान करने, किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करने और अलग-अलग रिकॉर्ड के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किया जाता है। हर व्यक्ति की उंगलियों के निशान अलग होते हैं, लेकिन जांचकर्ताओं के सामने बड़ी चुनौती यह थी कि इन निशानों को दर्ज, वर्गीकृत और आपस में मिलान करने का कोई प्रभावी तरीका कैसे बनाया जाए। इसी सवाल का जवाब खोजने की कहानी औपनिवेशिक भारत से जुड़ती है।
फिंगरप्रिंट तकनीक की शुरुआत कैसे हुई?
1858 में ब्रिटिश अधिकारी जेम्स हर्शल ने बंगाल में दस्तावेजों की पुष्टि करने और लोगों की पहचान को लेकर होने वाले विवादों से बचने के लिए हाथों और उंगलियों के निशानों का इस्तेमाल शुरू किया। हर्शल उन अधिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने पहचान के लिए फिंगरप्रिंट की उपयोगिता को समझा। हालांकि, वे अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो इस तकनीक पर प्रयोग कर रहे थे।
1880 में स्कॉटलैंड के डॉक्टर हेनरी फॉल्ड्स ने विज्ञान पत्रिका नेचर में एक लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने बताया कि उंगलियों के निशानों का इस्तेमाल लोगों की पहचान करने और अपराधों की जांच में किया जा सकता है। इसके बाद फ्रांसिस गैल्टन ने फिंगरप्रिंट के पैटर्न और उनकी विशिष्ट विशेषताओं का अध्ययन किया।
लेकिन एक बड़ी समस्या अब भी बनी हुई थी। पुलिस के पास बड़ी संख्या में फिंगरप्रिंट जमा होने पर उन्हें इस तरह वर्गीकृत करना जरूरी था कि किसी खास व्यक्ति के निशान को कम समय में खोजा जा सके। इसी चुनौती का समाधान खोजने में भारतीय पुलिस अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस: फिंगरप्रिंट वर्गीकरण के पीछे भारतीय दिमाग
1890 के दशक में बंगाल पुलिस के दो सब-इंस्पेक्टर अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस ने एडवर्ड रिचर्ड हेनरी के साथ मिलकर फिंगरप्रिंट को वर्गीकृत करने की एक प्रणाली विकसित करने पर काम किया।
इस प्रणाली ने पुलिस के सामने मौजूद एक बड़ी समस्या को हल करने में मदद की। पहले किसी संदिग्ध के निशान की पहचान करने के लिए पुलिस को बड़ी संख्या में दर्ज निशानों की जांच करनी पड़ सकती थी। वर्गीकरण की नई व्यवस्था ने खोज के दायरे को सीमित करना और सही निशान तक पहुंचना आसान बनाया।
यह प्रणाली बाद में ‘हेनरी क्लासिफिकेशन सिस्टम’ के नाम से जानी गई। इसका नाम बंगाल पुलिस के तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल सर एडवर्ड रिचर्ड हेनरी के नाम पर पड़ा।
2018 में इंडियन जर्नल ऑफ हिस्ट्री ऑफ साइंस में गुरविंदर एस. सोढ़ी और जसजीत कौर का एक शोधपत्र प्रकाशित हुआ। इसमें दोनों भारतीय पुलिस अधिकारियों के योगदान पर प्रकाश डाला गया और बताया गया कि अपराध विज्ञान के क्षेत्र में उनके काम को लंबे समय तक वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे।
1897 में ब्रिटिश भारत में आपराधिक जांच के लिए इस प्रणाली को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इसी साल बंगाल की राजधानी कलकत्ता, जिसे आज कोलकाता कहा जाता है, में फिंगरप्रिंट ब्यूरो की स्थापना हुई। इससे फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की व्यवस्था को व्यवहार में लागू करना संभव हुआ। बाद में यह प्रणाली ब्रिटेन पहुंची और दुनिया के विभिन्न देशों की पुलिस व्यवस्था का हिस्सा बन गई।
फिंगरप्रिंट विश्लेषण का यह इतिहास औपनिवेशिक दौर की एक अहम सच्चाई सामने लाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में भारतीय अधिकारियों ने विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन कई बार उनके काम को वह पहचान नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी। यह इतिहास इस बात पर भी सवाल उठाता है कि विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उपलब्धियों का श्रेय किस तरह दर्ज किया जाता है।
फिंगरप्रिंट के जरिए सूचनाएं भेजने में भी हेम चंद्र बोस का योगदान
हेम चंद्र बोस का काम केवल फिंगरप्रिंट को वर्गीकृत करने तक सीमित नहीं था। जैसे-जैसे इस तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा, अलग-अलग पुलिस विभागों के बीच फिंगरप्रिंट से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान करना भी जरूरी हो गया। लेकिन दस्तावेजों और आंकड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना हमेशा आसान नहीं था, खासकर तब, जब अलग-अलग संस्थानों के रिकॉर्ड का मिलान करना हो।
1916 में बोस ने फिंगरप्रिंट से जुड़ी सूचनाएं टेलीग्राफ के जरिए भेजने के लिए एक विशेष कूट प्रणाली विकसित की। सोढ़ी और कौर के शोधपत्र में इस काम की तुलना ब्रिटिश पुलिस द्वारा विकसित इसी तरह की टेलीग्राफ प्रणालियों से की गई है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, 1921 में, बोस के काम के प्रकाशन के पांच साल बाद, स्कॉटलैंड यार्ड के अधिकारी चार्ल्स स्टॉकली कॉलिन्स ने फिंगरप्रिंट से संबंधित टेलीग्राम पर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। शोधकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि बोस ने एक अंक पर आधारित फिंगरप्रिंट वर्गीकरण प्रणाली विकसित की थी, जबकि इसी तरह की प्रणाली का श्रेय बाद में हैरी बैटली को दिया गया।
ये तथ्य फिंगरप्रिंट वर्गीकरण के इतिहास में बोस की भूमिका पर दोबारा विचार करने का आधार देते हैं। हालांकि, केवल इनके आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी प्रणाली के निर्माता वही थे। फिंगरप्रिंट विज्ञान में उनके कुछ योगदानों को उचित श्रेय नहीं मिला हो सकता है, जबकि कुछ दूसरे विकास स्वतंत्र रूप से भी हुए होंगे।
क्या भारत से चुराई गई थी फिंगरप्रिंट तकनीक?
इस पूरे इतिहास को केवल ‘चोरी’ कहना सही नहीं होगा, क्योंकि फिंगरप्रिंट तकनीक किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं थी। इसे कई लोगों के प्रयोगों, अध्ययनों और नए तरीकों के जरिए विकसित किया गया। हालांकि, अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस को अपेक्षित पहचान नहीं मिलने का सवाल आज भी महत्वपूर्ण है। यह औपनिवेशिक व्यवस्था में भारतीयों के वैज्ञानिक योगदान को मान्यता देने से जुड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचता है।
जेम्स हर्शल ने पहचान के लिए फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल किया। हेनरी फॉल्ड्स ने अपराध जांच में इसके उपयोग का सुझाव दिया, जबकि फ्रांसिस गैल्टन ने उंगलियों के निशानों के पैटर्न का अध्ययन किया। इसके बाद अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस ने फिंगरप्रिंट के वर्गीकरण की व्यवस्था विकसित करने में अहम योगदान दिया।
इसलिए, भले ही इन दोनों भारतीय अधिकारियों के नाम ब्रिटिश अधिकारी एडवर्ड रिचर्ड हेनरी की तुलना में कम प्रचलित हों, लेकिन फिंगरप्रिंट वर्गीकरण के विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।
2022 में सोढ़ी और कौर का एक अन्य शोधपत्र प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था Scientific Racism Faced by Indian Fingerprint Scientists During Colonial Rule: Need to Correct a Historical Wrong। इस शोध में औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों के साथ हुए भेदभाव और फिंगरप्रिंट वर्गीकरण के इतिहास में हेनरी को दिए गए श्रेय के सवाल पर चर्चा की गई।
शोधपत्र इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि औपनिवेशिक सत्ता की असमान व्यवस्था ने विज्ञान के क्षेत्र को भी प्रभावित किया। उस दौर में भारतीयों को अक्सर ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन सहायक भूमिकाओं में रखा जाता था, जबकि वैज्ञानिक उपलब्धियों का श्रेय अधिक प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों को मिलने की संभावना अधिक थी।
औपनिवेशिक शासन की परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों के साथ हुए भेदभाव का सवाल महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस विषय पर चर्चा करते समय ऐतिहासिक तथ्यों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह तय करना भी जरूरी है कि किस व्यक्ति ने क्या योगदान दिया था।
फॉरेंसिक साइंस के लिए यह इतिहास क्यों महत्वपूर्ण है?
फिंगरप्रिंट की पहचान फॉरेंसिक साइंस यानी अपराधों की वैज्ञानिक जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मदद से पुलिस अपने रिकॉर्ड व्यवस्थित कर सकती है और अपराध स्थल से मिले नए निशानों की तुलना पहले से दर्ज निशानों से कर सकती है। भारत में औपनिवेशिक दौर में विकसित फिंगरप्रिंट वर्गीकरण प्रणाली ने इस प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
आज फिंगरप्रिंट की पहचान के लिए इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस और स्वचालित मिलान करने वाले कंप्यूटर प्रोग्राम जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इन विकासों की नींव उन शुरुआती तरीकों पर टिकी है, जिनके जरिए फिंगरप्रिंट को व्यवस्थित करना और उनका मिलान करना संभव हुआ था।
ऐसी महत्वपूर्ण तकनीक के इतिहास को याद रखना जरूरी है, खासकर तब, जब इसके विकास में योगदान देने वाले कुछ लोगों के नाम समय के साथ पीछे छूट गए हों।
अजीजुल हक और हेम चंद्र बोस को फॉरेंसिक साइंस के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तियों के रूप में याद किया जाना चाहिए। उन्हें केवल उस तकनीक के इतिहास के छोटे पात्रों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जो एक ब्रिटिश अधिकारी के नाम से जानी जाती है। फिंगरप्रिंट वर्गीकरण प्रणाली के विकास में उनके काम की अहम भूमिका थी और उसे उचित ऐतिहासिक पहचान मिलनी चाहिए।
इसलिए, यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि फिंगरप्रिंट विज्ञान और तकनीक भारत से चुरा ली गई थी। फिंगरप्रिंट विज्ञान की शुरुआत भारत में नहीं हुई थी, लेकिन इसके विकास और व्यावहारिक इस्तेमाल को आगे बढ़ाने में भारतीय अधिकारियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
विशेष रूप से, भारतीय पुलिस अधिकारियों ने फिंगरप्रिंट को व्यवस्थित ढंग से वर्गीकृत करने और उनसे जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए प्रणाली विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। विज्ञान के इतिहास में इस योगदान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान के आदान-प्रदान को याद रखना और उसका अध्ययन करना जरूरी है।
फिंगरप्रिंट तकनीक के इतिहास का यही वह महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिस पर आज फिर से ध्यान देने की जरूरत है।




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