Edinbox Hindi

भारतीय छात्र स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं, लेकिन क्या कॉलेज उन्हें सहयोग देने के लिए तैयार हैं?

भारत में युवाओं के बीच स्टार्टअप शुरू करने और नए उत्पाद विकसित करके अपना कारोबार खड़ा करने की रुचि बढ़ रही है। अधिक से अधिक छात्र उद्यमिता को करियर के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए जरूरी हो गया है कि वे विद्यार्थियों को सही मार्गदर्शन, सहयोग और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराएं।

यह उत्साहजनक संकेत है कि भारत के कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र अब केवल नौकरी पाने तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे अपना कारोबार शुरू करना, नए उत्पाद बनाना और खुद अपने बॉस बनना चाहते हैं। हालांकि, जब उद्यमिता युवाओं के बीच करियर का एक विकल्प बन रही है, तो सवाल यह है कि क्या भारतीय कॉलेज वास्तव में उनके इन सपनों को पूरा करने में मदद करने के लिए तैयार हैं?

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी और REVA यूनिवर्सिटी के सहयोग से किए गए GUESSS India 2025 सर्वेक्षण ने इस सवाल पर रोशनी डाली है। GUESSS India की इस रिपोर्ट में 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 1,200 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले 25,783 विद्यार्थियों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट भारतीय विद्यार्थियों की उद्यमिता से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं को सामने रखती है।

ये आंकड़े उत्साह बढ़ाने वाले हैं, लेकिन इनके साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है। भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अब तक मुख्य रूप से विद्यार्थियों को नौकरी के लिए तैयार करने पर केंद्रित रही है, न कि अपना कारोबार शुरू करने के लिए।

समस्या छात्रों में महत्वाकांक्षा की कमी नहीं है

कई वर्षों से देश के उच्च शिक्षण संस्थानों का जोर विद्यार्थियों को बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों या सरकारी संगठनों में अच्छी नौकरी दिलाने की तैयारी पर रहा है। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद ऐसी नौकरियों को सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प माना जाता रहा है। यही वजह है कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान इंटरव्यू की तैयारी करने और बड़ी कंपनियों या सरकारी विभागों में नौकरी पाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है।

लेकिन अब समय बदल रहा है और विद्यार्थियों की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद अपना कारोबार शुरू करने की इच्छा बढ़ी है। वहीं, सरकारी नौकरी और बड़ी कंपनियों में काम करने को प्राथमिकता देने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है।

इसका मतलब यह नहीं है कि विद्यार्थी अब सुरक्षित और स्थिर नौकरी नहीं चाहते। बल्कि, इनमें से कई छात्र करियर के पारंपरिक रास्ते से अलग विकल्प तलाशने के लिए तैयार दिखाई देते हैं।

विद्यार्थियों की बदलती सोच के साथ शिक्षण संस्थानों को भी अपनी भूमिका पर दोबारा विचार करना चाहिए। जब कई छात्र खुद रोजगार पैदा करना चाहते हैं, तो उन्हें केवल नौकरी खोजने के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है।

बिजनेस का आइडिया होना और कारोबार चलाना अलग-अलग बातें हैं

सर्वेक्षण यह भी बताता है कि बहुत से विद्यार्थी उद्यमी बनना चाहते हैं, लेकिन अपना कारोबार शुरू करने का विचार रखने और वास्तव में उसे चलाने के बीच बड़ा अंतर है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी अपनी पहली बिक्री कर पाए, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 23 प्रतिशत था। इसके अलावा, भारत के लगभग आधे विद्यार्थियों के पास अपने माता-पिता के अलावा कोई उद्यमी आदर्श नहीं था, जिससे वे प्रेरणा या मार्गदर्शन ले सकें।

ये आंकड़े बताते हैं कि कॉलेजों को केवल उद्यमी बनने की इच्छा पैदा करने के बजाय विद्यार्थियों को वास्तविक कारोबार चलाने की जानकारी और अनुभव देने पर ध्यान देना होगा।

स्टार्टअप शुरू करने के लिए विद्यार्थियों को केवल जागरूकता अभियान, इनोवेशन सेल या उद्यमिता से जुड़ी कार्यशालाओं की जरूरत नहीं है। उन्हें ऐसा सहयोगी माहौल चाहिए, जहां अनुभवी लोग मार्गदर्शन दें, आर्थिक मदद के विकल्प उपलब्ध हों और कारोबार से जुड़े लोगों के साथ संपर्क बनाने का अवसर मिले। तभी उनके विचार केवल कागजों तक सीमित रहने के बजाय वास्तविक व्यवसाय का रूप ले सकते हैं।

किसी बिजनेस मॉडल का कागज पर अच्छा दिखना और बाजार में सफल होना अलग-अलग बातें हैं। जो विद्यार्थी पहली बार अपना उत्पाद बेचता है, उसे इस अनुभव से उतना कुछ सीखने को मिल सकता है, जितना शायद वह पूरे साल की पढ़ाई से भी न सीख पाए।

स्टार्टअप फेस्टिवल और उद्यमिता से जुड़े कार्यक्रम निश्चित रूप से विद्यार्थियों को इस क्षेत्र के बारे में जानने का अवसर देते हैं। लेकिन यदि ऐसे आयोजनों के बाद कॉलेज विद्यार्थियों को कोई ठोस सहयोग नहीं देते, तो इन कार्यक्रमों का असर प्रचार तक ही सीमित रह सकता है।

केवल स्टार्टअप कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं

देशभर के कॉलेजों को सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर उद्यमिता को बढ़ावा देने के अपने मौजूदा प्रयासों की समीक्षा करनी चाहिए। केवल कार्यक्रमों और कार्यशालाओं के जरिए विद्यार्थियों में रुचि पैदा करना पर्याप्त नहीं है। संस्थानों को यह भी देखना होगा कि वे विद्यार्थियों के विचारों को वास्तविक कारोबार में बदलने में किस तरह मदद कर सकते हैं।

कॉलेजों को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या वे अच्छे व्यावसायिक विचार रखने वाले विद्यार्थियों की पहचान कर सकते हैं? क्या वे उन्हें अपने उत्पाद का शुरुआती नमूना यानी प्रोटोटाइप बनाने, संभावित ग्राहकों तक पहुंचने और असफलताओं से सीखने के लिए जरूरी सुविधाएं दे सकते हैं?

संस्थानों को यह भी देखना चाहिए कि कितने विद्यार्थी अपने विचार का प्रोटोटाइप तैयार कर पाते हैं या कम से कम एक ग्राहक तक पहुंचते हैं। कितने छात्र अपना कारोबार पंजीकृत कराते हैं, पहली बिक्री करते हैं या बाजार में इस्तेमाल के लायक शुरुआती उत्पाद तैयार करते हैं? इसके मुकाबले कितने विद्यार्थी केवल बिजनेस प्लान जमा करते हैं या किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं?

इन उपलब्धियों को मापना आसान नहीं है, लेकिन यदि शिक्षण संस्थान उद्यमिता को बढ़ावा देने के अपने प्रयासों को गंभीरता से लेते हैं, तो उन्हें ऐसे नतीजों को महत्व देना होगा। किसी स्टार्टअप फेस्टिवल में आने वाले लोगों की संख्या गिनने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी होगा कि उससे कितने विद्यार्थियों को अपना कारोबार शुरू करने में मदद मिली।

उद्यमिता के अवसर सभी विद्यार्थियों को मिलने चाहिए

उद्यमिता का अवसर केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जिनके पास पहले से आर्थिक संसाधन, संपर्क और सुविधाएं मौजूद हैं। इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन इसकी जरूरत लगातार बढ़ रही है।

छोटे शहरों में ऐसे विद्यार्थी हो सकते हैं जिनके पास शानदार व्यावसायिक विचार हों, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन देने वाला कोई न हो और न ही आर्थिक सहायता तक उनकी पहुंच हो। दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों के कुछ विद्यार्थी तकनीकी रूप से सक्षम हो सकते हैं और नए उत्पाद भी बना सकते हैं, लेकिन उन्हें कारोबार शुरू करने, वित्तीय प्रबंधन करने या ग्राहकों तक पहुंचने का अनुभव नहीं होता।

कुछ विद्यार्थियों के पास उद्यमियों से संपर्क या कारोबार की जानकारी नहीं होती, लेकिन वे अपना व्यवसाय चलाना सीखना चाहते हैं।

उद्यमिता से जुड़े सर्वेक्षण में सामने आए सवालों को देखते हुए कॉलेजों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लिंग, स्थान या दूसरी परिस्थितियों के कारण किसी विद्यार्थी के अवसर सीमित न हों। सभी इच्छुक विद्यार्थियों को मार्गदर्शकों, आर्थिक सहायता के विकल्पों, इन्क्यूबेशन सुविधाओं और संबंधित संस्थानों के साथ साझेदारी से लाभ उठाने का अवसर मिलना चाहिए।

GUESSS सर्वेक्षण के अनुसार, महिला विद्यार्थियों में उद्यमिता को लेकर महत्वाकांक्षा होने के बावजूद भारत में महिलाएं अपना कारोबार शुरू करने की इच्छा और उसे वास्तव में शुरू करने, दोनों मामलों में पीछे हैं।

यदि उद्यमिता से जुड़ी प्रतिभा की पहचान करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए संस्थागत स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कारोबार शुरू करने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा। केवल इच्छा से काम नहीं चलेगा; उसे वास्तविक अवसरों में बदलने के लिए जरूरी सहायता भी देनी होगी।

शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को नए अवसर पैदा करना सिखाए

हर विद्यार्थी के पास अपना कारोबार शुरू करने के लिए जरूरी संसाधन, क्षमता या जानकारी नहीं होती। कुछ विद्यार्थी नौकरी करके अपना करियर बनाना चाहते हैं, जबकि कुछ स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी आगे पढ़ना पसंद करते हैं। हर छात्र का अपना व्यवसाय शुरू करने का लक्ष्य होना जरूरी नहीं है।

समाज को शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, प्रशासकों, राजनेताओं, लेखाकारों और कई अन्य पेशेवरों की भी जरूरत है। ये सभी क्षेत्र लोगों को आजीविका कमाने और समाज में उपयोगी योगदान देने के अवसर प्रदान करते हैं। अपना कारोबार शुरू करना भी एक विकल्प है, लेकिन यह हर विद्यार्थी के लिए जरूरी या उपयुक्त नहीं है।

शिक्षा व्यवस्था की अहम भूमिका विद्यार्थियों को उनके चुने हुए क्षेत्र में सक्षम पेशेवर बनाने की है। हालांकि, सर्वेक्षण के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि अब ऐसे वैकल्पिक सहयोग तंत्र विकसित करने की भी जरूरत है, जो उद्यमी बनने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों को अपना पहला कदम उठाने में मदद करें।

कॉलेज स्टार्टअप फेस्टिवल जैसे कार्यक्रमों के जरिए विद्यार्थियों में उद्यमिता को लेकर उत्साह पैदा कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक उद्यमियों को तैयार करने के लिए संस्थानों को उनके विचारों पर काम करने, अनुभवी लोगों से मार्गदर्शन दिलाने और उन्हें अपने उत्पाद या कारोबार को हकीकत में बदलने के लिए समय और संसाधन देने होंगे।

भारतीय कॉलेजों के लिए क्या है संदेश?

भारत के कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने यह दिखा दिया है कि उनमें उद्यमी बनने की इच्छा मौजूद है। अब चुनौती ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार करने की है, जो इस इच्छा को वास्तविक काम और उपलब्धियों में बदलने में मदद करे।

आने वाले समय में किसी विश्वविद्यालय की पहचान केवल इस बात से नहीं होगी कि उसने कितने विद्यार्थियों को अपना स्टार्टअप शुरू करने का सपना दिखाया। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उसने कितने विद्यार्थियों को उस सपने को साकार करने की दिशा में पहला वास्तविक कदम उठाने में मदद की।

Raish Ahmed

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed