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भविष्य की चुनौतियों के लिए छात्रों को तैयार करने में विज्ञान, उद्यमिता और नेतृत्व की अहम भूमिका

स्कूलों में वैज्ञानिक सोच, समस्या सुलझाने की क्षमता और व्यावहारिक अनुभव पर जोर; अटल टिंकरिंग लैब, INSPIRE Awards-MANAK और इंटर्नशिप जैसे कार्यक्रम छात्रों को नई सोच विकसित करने का अवसर दे रहे हैं।

शिक्षा का उद्देश्य अब केवल अच्छे अंक हासिल करना और डिग्री प्राप्त करना नहीं रह गया है। तेजी से बदलती दुनिया में छात्रों के लिए स्वतंत्र रूप से सोचना, समस्याओं का समाधान खोजना और अपने ज्ञान का वास्तविक जीवन में इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी हो गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑटोमेशन, वैज्ञानिक प्रगति और कारोबार के नए तरीकों के कारण कामकाज की दुनिया बदल रही है। ऐसे में स्कूलों के सामने छात्रों को भविष्य की जरूरतों के अनुसार तैयार करने की चुनौती है।

अब छात्रों में नई चीजें सीखने की इच्छा, वैज्ञानिक सोच, रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता और उद्यमिता की समझ विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल अधिक छात्रों को विज्ञान पढ़ने या अपना कारोबार शुरू करने के लिए प्रेरित करना नहीं है, बल्कि उन्हें सवाल पूछने, समस्याओं को समझने और उनके व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए तैयार करना भी है।

रटकर सीखने से आगे बढ़ने की जरूरत

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में वैज्ञानिक सोच, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेने, रचनात्मकता, तार्किक क्षमता और समस्याओं को सुलझाने पर विशेष जोर दिया गया है। नीति में अनुभव के आधार पर सीखने और स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है।

इसका उद्देश्य छात्रों को अलग-अलग विषयों और व्यावहारिक कौशल से परिचित कराना है, ताकि वे बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकें और अपने ज्ञान का बेहतर इस्तेमाल कर सकें।

वैज्ञानिक शिक्षा की शुरुआत कॉलेज या विश्वविद्यालय पहुंचने के बाद ही नहीं होनी चाहिए। स्कूल स्तर पर प्रयोग, प्रोजेक्ट, कोडिंग, रोबोटिक्स और शोध से जुड़ी गतिविधियां छात्रों को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि किताबों में पढ़ाए जाने वाले सिद्धांत वास्तविक जीवन में कैसे काम आते हैं।

वैज्ञानिक सोच का मतलब केवल प्रयोगशाला में प्रयोग करना भी नहीं है। इसमें जानकारी पर सवाल उठाना, प्रमाणों की जांच करना, असफलताओं से सीखना और तर्क के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना शामिल है।

छात्रों में नई खोज और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे रही सरकार

स्कूलों में नवाचार और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की कई पहल चल रही हैं।

नीति आयोग के तहत अटल इनोवेशन मिशन (AIM) ने देशभर के स्कूलों में 10,000 अटल टिंकरिंग लैब (ATL) स्थापित की हैं। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, अक्टूबर 2025 तक इन प्रयोगशालाओं से 1.1 करोड़ से अधिक छात्र जुड़ चुके थे और 16 लाख से अधिक नवाचार परियोजनाओं को बढ़ावा मिला था।

मुख्य रूप से कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के लिए बनाई गई इन प्रयोगशालाओं में रोबोटिक्स, 3D प्रिंटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और प्रोटोटाइप तैयार करने जैसी तकनीकों से जुड़ने का अवसर मिलता है। यहां छात्र अपने विचारों को प्रयोग के जरिए परख सकते हैं, शुरुआती मॉडल बना सकते हैं और वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान खोज सकते हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहल INSPIRE Awards-MANAK कार्यक्रम है। इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), राष्ट्रीय नवाचार प्रतिष्ठान-भारत के सहयोग से लागू करता है। इसका उद्देश्य कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों को विज्ञान और समाज से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए नए विचार विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

DST के अनुसार, इस कार्यक्रम के लिए शैक्षणिक सत्र 2024-25 में 10.13 लाख से अधिक छात्रों के नामांकन प्राप्त हुए थे। 2025-26 में यह संख्या बढ़कर लगभग 11.47 लाख हो गई। चुने गए छात्रों को अपने विचारों को परियोजना और शुरुआती मॉडल में बदलने के लिए 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है।

ये पहल बताती हैं कि छात्रों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देने के बजाय प्रयोग करने, नए विचार विकसित करने और उन्हें वास्तविक रूप देने के अवसर देना क्यों जरूरी है।

स्कूल से ही उद्यमिता की समझ विकसित करना जरूरी

केवल वैज्ञानिक ज्ञान ही छात्रों को भविष्य के कार्यक्षेत्र के लिए तैयार करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अवसरों की पहचान करना, उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल, विचारों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना, टीम में काम करना और सोच-समझकर जोखिम उठाना भी महत्वपूर्ण कौशल हैं।

स्कूल में उद्यमिता की शिक्षा देने का मतलब यह नहीं है कि हर छात्र को अपना कारोबार शुरू करने के लिए कहा जाए। इसका उद्देश्य छात्रों को यह समझाना है कि किसी विचार को उपयोगी समाधान में कैसे बदला जाता है, संसाधनों का प्रबंधन कैसे होता है और कोई उत्पाद या सेवा लोगों की जरूरतों को कैसे पूरा करती है।

इंटर्नशिप, छात्रों की ओर से आयोजित कार्यक्रम, कारोबार से जुड़े अभ्यास, सामुदायिक परियोजनाएं और पेशेवरों के साथ बातचीत इस तरह की समझ विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

SAI इंटरनेशनल स्कूल के अनुसार, उसके ‘प्रशिक्षण’ इंटर्नशिप कार्यक्रम के तहत 2026 में 121 छात्रों को 18 संगठनों में काम सीखने का अवसर मिला। मुख्य रूप से कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों के लिए तैयार इस कार्यक्रम में तकनीक, वित्त, शोध, मीडिया, हॉस्पिटैलिटी, आर्किटेक्चर और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्र शामिल थे। छात्रों को AI, वेबसाइट विकास, वैज्ञानिक शोध, उपभोक्ता मनोविज्ञान और सामुदायिक विकास से जुड़े कामों का अनुभव मिला।

स्कूल ‘UNWIND’ नाम से छात्रों की ओर से आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव भी करता है। इसमें खास तौर पर कक्षा 11 और 12 के छात्र आयोजन की योजना बनाने, बजट तैयार करने, प्रायोजक खोजने, मार्केटिंग और कार्यक्रम प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियां निभाते हैं। संस्थान के अनुसार, 2024 में आयोजित इस महोत्सव में 30,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे।

SAI इंटरनेशनल एजुकेशन ग्रुप के निदेशक विक्रम आदित्य साहू के अनुसार, स्कूल की समग्र शिक्षा की सोच तीन प्रमुख बातों पर आधारित है—छात्र क्या सीखते हैं, कैसे सीखते हैं और उन्हें कौन पढ़ाता है। उनका मानना है कि नेतृत्व और उद्यमिता को स्कूल के वर्षों से ही शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, न कि केवल पढ़ाई के अलावा की जाने वाली गतिविधि के रूप में देखा जाना चाहिए।

साहू के मुताबिक, UNWIND में भाग लेने वाले छात्र कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने, प्रायोजकों के लिए संगठनों से संपर्क करने, कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ तालमेल बनाने और आयोजन के अलग-अलग कामों की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे उन्हें बजट प्रबंधन, बातचीत करने, टीम में काम करने और निर्णय लेने का व्यावहारिक अनुभव मिलता है।

इस तरह की गतिविधियां छात्रों को नेतृत्व, जवाबदेही और संसाधनों के सही इस्तेमाल की अहमियत समझने में मदद करती हैं। साथ ही, उन्हें गलतियों से सीखने का अवसर भी मिलता है, जहां मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक लाभ के बजाय सीखना और विकास करना होता है।

कक्षा से बाहर भी विज्ञान सीखने के अवसर

विज्ञान की पढ़ाई तब अधिक प्रभावी हो सकती है, जब छात्रों को निर्धारित पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर परियोजनाओं पर काम करने का अवसर मिले।

SAI इंटरनेशनल स्कूल का विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और डिजाइन से जुड़ा सम्मेलन ‘SAITED’ इसका एक उदाहरण है। इस कार्यक्रम में छात्र, शिक्षक और विशेषज्ञ विज्ञान तथा उभरती तकनीकों से जुड़े विषयों पर प्रदर्शनियों, प्रयोगों, कार्यशालाओं और चर्चाओं के माध्यम से विचार साझा करते हैं।

2025 में इस कार्यक्रम की थीम ‘Infinite Possibilities, Endless Realities: Science Beyond the Omniverse’ थी। इसके माध्यम से छात्रों को वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और नवाचार से जुड़े लोगों से बातचीत करने का अवसर भी मिलता है। छात्र प्रदर्शनियों और अपनी प्रस्तुतियों के जरिए विचारों को सामने रखते हैं।

इसका एक उदाहरण बिहार के रहने वाले मिथु हैं, जो SAI इंटरनेशनल रेजिडेंशियल स्कूल में पढ़ते हैं। मई 2025 में कक्षा 10 के छात्र रहते हुए उन्होंने भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन पर आधारित एक परियोजना तैयार की।

इस परियोजना को पूरा करने में लगभग पांच से छह दिन लगे। इसके बाद उन्होंने इसे पथानी सामंत तारामंडल में आयोजित यंग एस्ट्रोनॉमर्स प्रतियोगिता में प्रस्तुत किया, जहां उन्हें पहला पुरस्कार मिला। इसके बाद उन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जाने का अवसर मिला, जहां उन्होंने वैज्ञानिकों और भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम से जुड़े लोगों से बातचीत की।

मिथु की परियोजना का मुख्य विषय भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना और उन्हें सुरक्षित वापस लाना था। शिक्षकों ने उन्हें मिशन की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि समझने, इससे जुड़े लोगों की भूमिका जानने और अपनी परियोजना को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने में मदद की।

यह अनुभव दिखाता है कि स्कूल स्तर की परियोजनाएं और विज्ञान प्रतियोगिताएं छात्रों को पाठ्यपुस्तकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक उपलब्धियों को समझने और अपने विचारों को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करने का अवसर दे सकती हैं।

SAI इंटरनेशनल स्कूल की विज्ञान विभाग की डीन दिव्या सत्पथी के अनुसार, स्कूल में विज्ञान को पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रखा जाता। छात्रों को सवाल पूछने, तर्क करने, नई चीजें खोजने और प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। व्यावहारिक गतिविधियों के जरिए वे निरीक्षण करना, विश्लेषण करना और वैज्ञानिक सिद्धांतों को वास्तविक जीवन से जोड़ना सीखते हैं। इससे उनमें स्वतंत्र रूप से वैज्ञानिक सोच विकसित करने का आत्मविश्वास आता है।

नेतृत्व क्षमता भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा

छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने में दूसरों के साथ काम करना, जिम्मेदारियां संभालना और चुनौतियों का सामना करना सीखना भी जरूरी है।

स्कूल स्तर पर नेतृत्व कार्यक्रम छात्रों को इन गुणों को विकसित करने का अवसर दे सकते हैं। SAI इंटरनेशनल स्कूल में ‘SAI नेतृत्‍व’ नाम से कक्षा 1 से 12 तक के छात्रों के लिए नेतृत्व विकास कार्यक्रम चलाया जाता है। इसके आवासीय शिविरों में कक्षा आधारित सत्रों के साथ बाहरी गतिविधियां और टीम के रूप में पूरी की जाने वाली चुनौतियां शामिल हैं।

दीवार पर चढ़ना, रस्सी पर चलना, बाधा दौड़, योग, भूमिका निभाने वाले अभ्यास और सामुदायिक कार्य जैसी गतिविधियों के जरिए छात्रों में अनुशासन, समय प्रबंधन, टीमवर्क, मुश्किल परिस्थितियों से उबरने और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता विकसित करने का प्रयास किया जाता है। अलग-अलग आयु वर्ग के छात्रों के अनुसार गतिविधियां तय की जाती हैं। इनमें आत्मविश्वास, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर जोर दिया जाता है।

इस तरह की गतिविधियां शिक्षा के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने लाती हैं। भविष्य के लिए तैयार होने का मतलब केवल तकनीकी ज्ञान हासिल करना नहीं है। दूसरों के साथ मिलकर काम करना, अपनी बात स्पष्ट रूप से रखना, अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करना और जिम्मेदारी लेना भी पेशेवर जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण है।

बदलते भविष्य के लिए छात्रों को कैसे तैयार करें?

नवाचार और व्यावहारिक शिक्षा पर बढ़ते जोर के बावजूद अच्छी प्रयोगशालाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों, मार्गदर्शन और उद्योग जगत से जुड़ने के अवसरों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। केवल उपकरण उपलब्ध करा देने से बेहतर शिक्षा सुनिश्चित नहीं होती। शिक्षकों को भी ऐसी गतिविधियां कराने के लिए प्रशिक्षित होना चाहिए, जिनमें छात्र खुद प्रयोग कर सकें, स्वतंत्र रूप से सोचें और अपनी पढ़ाई का वास्तविक जीवन से संबंध समझें।

यह भी जरूरी है कि इस तरह के अवसर केवल बेहतर संसाधनों वाले निजी स्कूलों तक सीमित न रहें। सरकारी योजनाओं, कम लागत वाली तकनीक और स्कूलों तथा उद्योग जगत के बीच सहयोग से व्यावहारिक शिक्षा को अधिक से अधिक छात्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

भारत जब कुशल और नवाचार को बढ़ावा देने वाली अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो इसकी नींव स्कूली शिक्षा के दौरान ही रखनी होगी। सवाल पूछने, वैज्ञानिक तरीके से सोचने, मिलकर काम करने और विचारों को उपयोगी समाधान में बदलने की क्षमता छात्रों के भविष्य के करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

आखिरकार, छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने का अर्थ यह अनुमान लगाना नहीं है कि दस साल बाद कौन-सी नौकरियां उपलब्ध होंगी। असली उद्देश्य उनमें इतना आत्मविश्वास, ज्ञान और कौशल विकसित करना है कि वे लगातार बदलती दुनिया में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें।

Raish Ahmed

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