
तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद व पूर्व मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को लेकर कहा है कि सैद्धांतिक तौर पर तो इसके कुछ पहलू अच्छे हैं मगर इसकी व्यावहारिकता को लेकर चिंता है। वे कोयंबटूर में एसएसवीएम संस्थान द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।
इस दौरान जब कांग्रेस सांसद शशि थरूर से शिक्षा नीति को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, “शिक्षा नीति स्कूल और कॉलेज दोनों की शिक्षा को प्रभावित करती है और मुझे लगता है कि कॉलेज शिक्षा में सुधार की कुछ पहल, जैसे इसमें लचीलापन लाना, छात्रों को कई पाठ्यक्रम लेने की अनुमति देना आदि स्वागत योग्य कदम है। लेकिन स्कूली शिक्षा में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा शिक्षा प्रदान करने के विचार से मैं संतुष्ट नहीं हूँ क्योंकि उनमें से कई शिक्षित नहीं हैं।
साथ ही, उन्होंने कहा कि वे स्कूलों को 30 किलोमीटर के दायरे में स्थित अन्य स्कूलों के साथ सुविधाएं साझा करने की अनुमति देने के निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। व्यवहार में, कोई भी स्कूल जिसके पास खेल का मैदान नहीं है, अपने बच्चों को हर दिन दूर के खेल के मैदान में नहीं ले जाता।
उन्होंने इसे लेकर संदेह जताया और कहा कि यह सिर्फ एक कागजी कार्रवाई होगी-स्कूल को पर्याप्त मानकों के बिना काम करने की अनुमति देने की। थरूर ने कहा कि “शिक्षा नीति में कुछ सुविधाएँ कागज़ पर तो अच्छी लगती हैं, लेकिन मैं व्यवहार में इसे लेकर चिंतित हूँ। जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि एक ही स्कूल में संगीत और गणित सीखने की सुविधा होनी चाहिए। हालाँकि यह शायद सच है, दोनों विषयों के लिए अलग-अलग बुनियादी ढाँचे की ज़रूरत है और संकाय। इसमें पैसे लगते हैं और इसका भुगतान कौन करेगा? क्या सरकार इन सभी नवाचारों को सब्सिडी देने के लिए अपने बजट को पर्याप्त रूप से बढ़ाने जा रही है या हम शिक्षा को और अधिक अमीरों तक सीमित करने जा रहे हैं?”
“स्कूल अतिरिक्त लागत माता-पिता पर डाल देंगे। लेकिन मैं चाहता हूं कि शिक्षा की गुणवत्ता उत्कृष्ट हो और यह बहुत बढ़िया होगा अगर हर स्कूल में गणित और संगीत दोनों की पढ़ाई हो। लेकिन सरकार को इन सभी के लिए संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। तभी लोग इन विचारों से लाभान्वित हो सकते हैं।”




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