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रेवेंशॉ विश्वविद्यालय का नाम बदलने के शिक्षा मंत्री के सुझाव पर मचा राजनीतिक घमासान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बीते दिनों स्वशासन दिवस (31 अगस्त) के अवसर पर कटक में एक समारोह में बोलते हुए कुछ ऐसी बात कह दी जिसने राज्य के छात्रों व बुद्धिजीवीयों के बीच एक बहस छेड़ दी है। इस बहस में उनके साथ राजनैतिक दल भी पक्ष या विरोध में मैदान में उतर आये हैं। दरअसल, प्रधान ने राज्य के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान “रेवेंशॉ विश्वविद्यालय” का नाम बदलने का सुझाव दिया था जिसपर बवाल मच गया है।
 
प्रधान ने सवाल उठाया था कि “विश्वविद्यालय का नाम एक ऐसे ब्रिटिश अधिकारी के नाम पर रखा जाना कितना औचित्यपूर्ण है जो ओड़िया लोगों को दुःख पंहुचाने का जिम्मेदार है? 1866 में ओड़िशा में आये विनाशकारी अकाल में दस लाख लोग मृत्यु के गाल में समा गए। उस समय रेवेंशॉ,  जो ओड़िशा संभाग के आयुक्त थे, ने क्या किया? उनका महिमा मंडन करना उचित नहीं है। यह बात मैं व्यक्तिगत तौर पर कह रहा हूं। राज्य के बुद्धिजीवियों को इसपर सोचना चाहिए। इस मुद्दे पर बहस की जरूरत है।”  

शिक्षा मंत्री के इस वक्तव्य ने राज्य के छात्रों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों के बीच एक बहस छेड़ दी है। विश्वविद्यालय के कईं पुराने छात्र, जानी-मानी हस्तियां इससे सहमत नहीं हैं। पूर्व छात्र (1957-1960)  राज्य के मुख्य सचिव रहे सहदेव साहू कहते हैं, “रेवेंशॉ ने संस्थान की स्थापना कर ओड़िशा के गौरव को बरकरार रखा। उन्होंने ओड़िया भाषा को संघर्ष के समय पहचान दी। वे ओड़िशा के लोगों के दुःख के जिम्मेदार नहीं थे।” एक अन्य पुराने छात्र, शिक्षाविद सत्यकाम मिश्रा कहते हैं, “जो लोग ओड़िशा में रेवेंशॉ के योगदान को जानते हैं, वे संस्थान का नाम बदलने के पक्ष में नहीं होंगे। अगर हमारे छात्र आज ओड़िया पढ़ पा रहे हैं तो यह ब्रिटिश रेवेंशॉ की वजह से है।”

अधिकांश लोग कह रहे हैं कि ओड़िशा में उच्च शिक्षा की नींव रखने का श्रेय रेवेंशॉ को जाता है। थॉमस एडवर्ड रेवेंशॉ 1865 में ओड़िशा संभाग के आयुक्त नियुक्त हुए थे।1866 के भीषण अकाल के बाद ओड़िशा के लोगों और कुछ उदारवादी अंग्रेजों ने कटक में एक कॉलेज शुरू करने पर विचार करना शुरू किया। ओड़िया छात्रों की उच्च शिक्षा पाने में कठिनाइयों को महसूस करते हुए उन्हें सुविधा मुहैया कराने के लिए थॉमस एडवर्ड रेवेंशॉ ने बंगाल सरकार को कॉलेज स्थापना के लिये पत्र लिखा। बंगाल सरकार ने एक शर्त के साथ प्रस्ताव को मंजूरी दी कि इसमें आम लोगों की ओर से तीस हजार रुपये का योगदान एकत्रित किया जाये। रेवेंशॉ ने यह शर्त स्वीकार कर ली।

रेवेंशॉ के प्रयासों और मयूरभंज के महाराज कृष्णचन्द्र भंजदेव द्वारा बीस हजार रुपये के स्थायी दान की मदद की वजह से प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई। इस तरह ओड़िशा में पहला कॉलेज जनवरी 1868 में स्थापित हुआ। कटक जिला स्कूल परिसर में कॉलेज की शुरुआत हुई। इसमें माध्यमिक स्तर (intermediate) की कक्षाएं छः छात्राओं के साथ शुरू हुई। फिर कमिश्नर रेवेंशॉ ने कॉलेजिएट स्कूल को पूर्ण स्नातक कॉलेज बनाने का प्रस्ताव दिया। 1876 में कॉलेजिएट स्कूल पूर्ण रूप से डिग्री कॉलेज बन गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्व इस कॉलेज में उस समय 19 छात्र थे। इसका नाम कटक कॉलेज रखा गया। पर मयूरभंज महाराज ने शिक्षा के विकास में रेवेंशॉ के योगदान को देखते हुए इसका नामकरण रेवेंशॉ के नाम पर करने का दबाव डाला। इस तरह 1878 में कटक कॉलेज का नाम बदलकर रेवेंशॉ कॉलेज कर दिया गया। 1881 में इस कॉलेज को स्थायी मान्यता मिली।

इसमें अंग्रेजी, ओड़िया, संस्कृत, पर्शियन, गणित, दर्शन शास्त्र, भौतिकी, रसायन, वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई शुरू हुई। कटक में लगभग 87 एकड़ भूमि पर फैले रेवेंशॉ विश्वविद्यालय के अधीन इस समय नौ स्कूल और 33 विभाग हैं। यंहा आठ हजार छात्र छात्राएं पढ़ते हैं।  2006 में राज्य सरकार ने कॉलेज को विश्वविद्यालय की मान्यता दी है।

रेवेंशॉ कॉलेज के इतिहास पर नजर डाले तो यंहा से ओड़िशा के असंख्य नामी, प्रतिष्ठित ओड़िया विद्वान पढ़कर निकले हैं। इनमें प्रमुख नाम है उत्कल गौरब मधुसूदन दास, आचार्य हरिहर दस, पंडित गोपबन्धु दास, पंडित नीलकण्ठ दस,  पी के परिजा, कालिंदी चरण पाणीग्राही, आंनद शंकर राय, गोपीनाथ महान्ति, मनीज दस, पूर्व मुख्यमंत्री हरेकृष्ण महताब, बीजू पटनायक, नन्दिनी सतपथी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रवि राय, उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा आदि। 156 वर्ष पुराने रेवेंशॉ विवि ने ओड़िशा में शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। राज्य के प्रथम विश्वविद्यालय-  उत्कल विश्वविद्यालय, भुबनेश्वर – की शुरुआत भी रेवेंशॉ कॉलेज के एक हिस्से में 1943 में हुई थी।

1 अप्रैल 1936 को जब ओड़िशा अलग प्रदेश बना तो उस समय ओड़िशा के गवर्नर के रूप में सर जॉन ऑस्टिन हब्बाक को रेवेंशॉ  कॉलेज सभागार में, जिसे अब हेरीटेज हॉल कहा जाता है, 9 जनवरी,1937 को शपथ दिलाई गई थी। राज्य विधानसभा का पहला कामकाज भी 28 जुलाई, 1937 को इसी कॉलेज परिसर में शुरू हुआ था। 
इतने गौरवमयी इतिहास  की गवाह  रेवेंशॉ विश्वविद्यालय शिक्षा मंत्री के बयान की वजह से विवादों में घिर गई है।

प्रमुख विपक्षी दल बीजद और कांग्रेस ने मुद्दे को लपकते हुए शिक्षा मंत्री से माफी मांगने की मांग की हैं। बीजद प्रवक्ता लेनिन महंती ने प्रधान के बयान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि मंत्री को राज्य के इतिहास और ओड़िशा में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रेवेंशॉ के योगदान के विषय में कोई ज्ञान नहीं है।” कांग्रेस की बारबाटी-कटक की विधायिका सोफिया फिरदौस ने कहा कि भाजपा को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए और उसे संस्थाओं के नाम और रंग बदलने के निर्रथक कामों से बचना चाहिए। मंत्री को नाम बदलने की जगह इसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए।

विपक्षी दलों की बयानबाजी के बाद भाजपा प्रधान का बचाव करने मैदान में आ गई। उपमुख्यमंत्री केवी सिंहदेव और उच्च शिक्षा मंत्री सूरज सूर्यवंशी ने विरोधी दलों से इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने से बचने की सलाह देते हुए कहा कि यह मंत्री का निजी सुझाव है, वे अपनी बात कहने को स्वतंत्र हैं।

भाजपा प्रवक्ता अनिल बिश्वाल ने कहा, ” बीजद की पुरानी आदत है गैर ओड़िया लोगों के पक्ष में बोलने की। अब तो उन्होंने एक ब्रिटिश अधिकारी के समर्थन में सारी सीमाएं लांघ दी हैं। केंद्रीय मंत्री ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत इसपर विचार करने का एक सुझाव भर दिया है। इस पर इतनी हायतौबा मचाने की क्या जरूरत है !”

राज्य के प्रमुख ओड़िया दैनिक संबाद के चेयरमैन सौम्य रंजन पटनायक ने धर्मेंद्र प्रधान को किसी भी मंच पर उन्हें वितर्क करने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि नाम बदलने से संस्थान का चरित्र नहीं बदल जायेगा और न ही शिक्षा की गुणवत्ता में फर्क पड़ेगा। शिक्षा मंत्री को शिक्षा में सुधार के प्रति ध्यान देना चाहिए।

मंत्री के बयान के बाद छात्र भी सड़क पर उतर आए हैं। भाजपा बयान को व्यक्तिगत कहकर ठंडा करने की कोशिश में जुटी है। छात्र उबाल किस जगह थमेगा, यह देखना होगा।

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