– कनिष्का
भारत ने बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाने और उनका दाखिला सुनिश्चित करने में काफी प्रगति की है। लेकिन किसी बच्चे का स्कूल में दाखिला होना और वहां जाकर वास्तव में सीखना, दो अलग-अलग बातें हैं। दाखिले के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा व्यवस्था कितने बच्चों तक पहुंच रही है, लेकिन इनसे यह पता नहीं चलता कि बच्चे कितना सीख रहे हैं और सीखी हुई बातों को कितना याद रख पा रहे हैं।
यही वह सीखने का अंतर है, जिस पर अब भारत को विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
कोई बच्चा नियमित रूप से स्कूल जा सकता है, अपना होमवर्क पूरा कर सकता है और परीक्षाएं भी दे सकता है। इसके बावजूद संभव है कि वह खुद से एक अनुच्छेद न पढ़ पाए या गणित के आसान सवाल हल न कर सके। कई बार इस समस्या का पता तब चलता है, जब उसे कोई नया और कठिन विषय पढ़ाया जाता है। बुनियादी समझ कमजोर होने के कारण वह नई जानकारी को ठीक से समझ नहीं पाता।
समस्या हमेशा यह नहीं होती कि बच्चे स्कूल नहीं जाते या महीने में कुछ ही दिन स्कूल पहुंचते हैं। कई बच्चे नियमित रूप से स्कूल आते हैं, फिर भी जरूरी कौशल हासिल नहीं कर पाते। शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी यही कमी सीखने का अंतर कहलाती है।
भारत में बच्चों के सीखने की स्थिति
वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER) 2024 के अनुसार, पढ़ने की क्षमता बच्चों की बुनियादी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। वर्ष 2024 में सरकारी स्कूलों की कक्षा 3 के उन विद्यार्थियों का प्रतिशत बढ़ा, जो कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। यह सुधार का संकेत है, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बुनियादी पढ़ने की क्षमता को बेहतर बनाने के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है।
बच्चे शुरुआती कक्षाओं में जो बुनियादी कौशल सीखते हैं, उनका असर आगे की पूरी पढ़ाई पर पड़ता है। जो बच्चा ठीक से पढ़ नहीं पाता, उसके लिए विज्ञान की अवधारणाओं को समझना, इतिहास से जुड़े दस्तावेजों को पढ़ना या परीक्षा में पूछे गए सवालों का अर्थ समझना मुश्किल हो सकता है।
इसी तरह, गणित की कमजोर समझ दूसरे विषयों को सीखने में भी बाधा बन सकती है। जब बच्चों की बुनियादी तैयारी मजबूत नहीं होती, तो आगे की कक्षाओं में पहुंचने के बाद उन्हें नए विषय समझने में परेशानी होती है। इस तरह सीखने का अंतर बढ़ता जाता है। पाठ्यक्रम में उनसे कुछ खास बातें जानने और समझने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन वे उस स्तर तक नहीं पहुंच पाते।
इसलिए शिक्षा व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल दाखिले के आंकड़ों से नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने के नतीजों से भी किया जाना चाहिए। किसी कक्षा में बच्चे, शिक्षक और पढ़ने के लिए कमरा मौजूद होना अच्छी बात है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि बच्चे वास्तव में सीख भी रहे हैं।
जब समझने से ज्यादा जरूरी हो जाता है पाठ्यक्रम पूरा करना
भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती परीक्षाओं और समय पर पाठ्यक्रम पूरा करने पर जरूरत से ज्यादा जोर देना है। विद्यार्थियों से अक्सर परिभाषाएं याद करने, किताबों में दिए गए उत्तर लिखने और पहले से अभ्यास किए गए सवालों को हल करने की अपेक्षा की जाती है। इन तरीकों से बच्चे किताब की जानकारी याद तो कर सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे उस विषय को सही ढंग से समझ भी पाएं।
कोई विद्यार्थी विज्ञान का सिद्धांत शब्दशः याद कर सकता है, लेकिन उसे यह पता नहीं हो सकता कि वह वास्तव में काम कैसे करता है। इसी तरह, कोई बच्चा पर्यावरण प्रदूषण पर सवाल का जवाब सुना या लिख सकता है, लेकिन उसे यह समझ न हो कि प्रदूषण उसके अपने इलाके और समुदाय को किस तरह प्रभावित करता है।
समस्या रटकर याद करने में नहीं, बल्कि उसे समझ का विकल्प मान लेने में है। बच्चों को केवल जानकारी याद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें सीखी हुई बातों का इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। इसके लिए कक्षा में उन्हें सवाल पूछने, चर्चा करने, प्रयोग करने और अपने शब्दों में नतीजे समझाने का पर्याप्त समय और अवसर मिलना चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में विषयों को समझकर सीखने, बुनियादी पढ़ने और गणित की क्षमता विकसित करने तथा कौशल आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है। हालांकि, असली चुनौती इन लक्ष्यों को कक्षाओं में प्रभावी ढंग से लागू करने की है।
शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल समान अवसरों से भी जुड़ा है
हर बच्चे को स्कूल आने से पहले सीखने के समान अवसर नहीं मिलते। कुछ बच्चों के पास किताबें, ऑनलाइन पढ़ाई के साधन, निजी ट्यूशन और पढ़ाई में मदद करने वाले माता-पिता होते हैं। वहीं, कई बच्चे पढ़ाई के लिए मुख्य रूप से स्कूल और वहां मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर रहते हैं।
अगर कोई बच्चा स्कूल में किसी परीक्षा की तैयारी ठीक से नहीं कर पाता, तो बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवार का बच्चा घर पर ट्यूशन या दूसरी मदद ले सकता है। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चे के पास यह सुविधा नहीं भी हो सकती है।
इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल केवल परीक्षा के नतीजे सुधारने तक सीमित नहीं है। यह समान अवसर और जरूरी सहायता उपलब्ध कराने का भी सवाल है। भारत को औसत शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर बनाने के साथ-साथ बच्चों के बीच सीखने से जुड़ी असमानताओं को भी दूर करना होगा।
स्कूलों को बच्चों की कमजोरियों की समय रहते पहचान करनी चाहिए और उन्हें अतिरिक्त सहायता व संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। यह भी समझना जरूरी है कि हर बच्चा एक ही गति से नहीं सीखता। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का अर्थ है हर बच्चे को आगे बढ़ने का उचित अवसर देना। इसे केवल उन बच्चों की मदद तक सीमित नहीं किया जा सकता, जिन्हें स्पष्ट रूप से परेशानी होती दिखाई देती है, क्योंकि अलग-अलग बच्चों को अलग-अलग स्तर की सहायता की जरूरत हो सकती है।
बच्चों को बेहतर सिखाने के लिए शिक्षकों को भी सहयोग चाहिए
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की किसी भी योजना में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षकों पर पाठ्यक्रम पूरा करने, विद्यार्थियों की कॉपियां और परीक्षाएं जांचने, कक्षा में अनुशासन बनाए रखने और अलग-अलग क्षमताओं वाले बच्चों को पढ़ाने का दबाव रहता है। काम का बोझ इतना अधिक हो सकता है कि उन्हें उन विद्यार्थियों पर अलग से ध्यान देने का पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाता, जो पढ़ाई में पीछे रह रहे हैं।
सभी बच्चों के सीखने के स्तर को बेहतर बनाने के लिए यह समझना जरूरी है कि शिक्षकों को किस तरह के सहयोग की आवश्यकता है। इसमें बेहतर शिक्षण कौशल, पर्याप्त संसाधन और बच्चों की कमजोरियों को पहचानने तथा उन्हें दूर करने के लिए समय देना शामिल है।
मूल्यांकन की प्रक्रिया में भी बदलाव की जरूरत है। इसका उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को अंक देना नहीं होना चाहिए। मूल्यांकन से शिक्षकों को यह समझने में मदद मिलनी चाहिए कि बच्चे कहां और किस विषय में कमजोर हैं, ताकि उनकी जरूरत के अनुसार पढ़ाने के तरीके और अतिरिक्त सहायता तय की जा सके।
तकनीक के जरिए बच्चों को पढ़ाई की सामग्री और अभ्यास के अतिरिक्त अवसर दिए जा सकते हैं। लेकिन सही शिक्षण और मार्गदर्शन के बिना तकनीक का पूरा लाभ नहीं मिल सकता। ऑनलाइन परीक्षा या अभ्यास सामग्री उपलब्ध होने भर से यह सुनिश्चित नहीं होता कि बच्चे बेहतर तरीके से सीख पाएंगे। तकनीक एक साधन है, जिसका प्रभावी इस्तेमाल करने के लिए बच्चों को उचित मार्गदर्शन देना जरूरी है।
इसलिए उपलब्ध संसाधनों, खासकर तकनीक, का सही इस्तेमाल करने पर जोर दिया जाना चाहिए। स्कूलों में दाखिले बढ़ने के आंकड़ों को ही शिक्षा की सफलता का प्रमाण मान लेने के बजाय यह देखना जरूरी है कि बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता में कितना सुधार हो रहा है।
भारत को मापना होगा कि बच्चे वास्तव में क्या सीख रहे हैं
भारत की शिक्षा व्यवस्था अब ऐसे दौर में पहुंच गई है, जहां केवल स्कूलों तक पहुंच और दाखिले के आंकड़ों से प्रगति का आकलन करना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि बच्चे वास्तव में क्या सीख रहे हैं और उस ज्ञान का इस्तेमाल कैसे कर पा रहे हैं।
दाखिले के आंकड़े बताते हैं कि कितने बच्चे शिक्षा व्यवस्था तक पहुंच रहे हैं। परीक्षा के नतीजे विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों के बारे में कुछ जानकारी देते हैं। लेकिन सीखने के आकलन से पता चलता है कि बच्चे वास्तव में क्या कर सकते हैं—क्या वे किसी पाठ को समझकर पढ़ सकते हैं, गणना कर सकते हैं, किसी विषय को अपने शब्दों में समझा सकते हैं और सीखी हुई बातों को वास्तविक जीवन में लागू कर सकते हैं।
सीखने के आकलन से मिलने वाले नतीजों का इस्तेमाल स्कूलों और नीति बनाने वालों को कमियों की पहचान करने तथा जरूरत के मुताबिक सहायता पहुंचाने के लिए करना चाहिए। इन नतीजों को केवल प्रगति दिखाने वाले आंकड़ों का एक और संग्रह बनाकर नहीं छोड़ देना चाहिए।
इस बदलाव में समय लगेगा। बच्चों की बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना आसान नहीं है। अलग-अलग राज्यों, जिलों और स्कूलों में चुनौतियां भी अलग हैं। इसलिए हर जगह एक ही तरीका अपनाने के बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार कदम उठाने होंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत को शिक्षा तक बच्चों की पहुंच बढ़ाने पर काम जारी रखना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि बच्चे सीखने, सोचने और अपने ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता हासिल करें।
भारत के सामने शिक्षा की असली चुनौती केवल ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल पहुंचाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल आने वाला हर बच्चा वहां से वास्तविक ज्ञान और जरूरी कौशल हासिल कर सके। देश का भविष्य बेहतर बनाने के लिए शिक्षा तक पहुंच के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण सीखना भी अनिवार्य है।




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