प्रो. उज्ज्वल के. चौधरी
जो देश अपने बच्चों को पढ़ना नहीं सिखा सकता, वह नवाचार पर आधारित अर्थव्यवस्था नहीं बना सकता। इसी तरह, जब मोहल्ले और गांव के सरकारी स्कूलों में शिक्षक कम होने लगें, लोगों का भरोसा टूटने लगे और कई जगह इमारतों की छत तक सुरक्षित न रहे, तो उस देश के लिए अपनी युवा आबादी को ताकत बताना भी मुश्किल हो जाता है। भारत के सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बच्चों का दाखिला तो हो रहा है, लेकिन उन्हें अच्छी और भरोसेमंद शिक्षा नहीं मिल पा रही। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों को होता है जिनके माता-पिता निजी स्कूलों का खर्च नहीं उठा सकते।
94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए: आंकड़ों को सही संदर्भ में समझें
नीति आयोग की मई 2026 की रिपोर्ट School Education System in India के अनुसार, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख थी, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गई। यानी करीब 94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए। रिपोर्ट में इस गिरावट के पीछे स्कूलों को मिलाने और उनकी संख्या को तर्कसंगत बनाने की प्रक्रिया का भी उल्लेख है।
हालांकि, केवल स्कूलों की कुल संख्या घटने से यह साबित नहीं होता कि कितने गांवों या बस्तियों में बच्चों की शिक्षा तक पहुंच खत्म हो गई। छोटे स्कूलों को मिलाने से शिक्षकों और सुविधाओं का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन अगर इसके कारण बच्चों को असुरक्षित रास्तों से लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो प्रशासन की बचत का बोझ बच्चों पर पड़ता है।
आदिवासी बस्तियों, पहाड़ी गांवों और सुंदरबन जैसे नदी-द्वीप वाले इलाकों में स्कूल तक पहुंचना सिर्फ दूरी का सवाल नहीं है। जंगल, नदियां, मौसम और बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता की चिंताएं भी इसमें शामिल हैं।
इसलिए हर स्कूल को दूसरे स्कूल में मिलाने से पहले सार्वजनिक रूप से यह आकलन होना चाहिए कि बच्चों को नया स्कूल कितनी दूर पड़ेगा, वहां पहुंचने के लिए सुरक्षित परिवहन उपलब्ध होगा या नहीं और वे नियमित रूप से पढ़ाई कर पाएंगे या नहीं।
दाखिला तो है, लेकिन सीखने में बच्चे पीछे
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति पर आधारित ASER 2024 सर्वेक्षण के अनुसार, 6 से 14 वर्ष के 98.1 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में नामांकित थे। लेकिन सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 16.3 प्रतिशत था।
यानी सुधार हुआ है, लेकिन अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। स्कूल में दाखिला होना और वास्तव में पढ़ना-लिखना सीखना दो अलग-अलग बातें हैं।
UDISE+ के 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 1,00,843 ऐसे स्कूल थे जहां केवल एक शिक्षक था। यह स्थिति तब है जब देश में शिक्षकों की कुल संख्या एक करोड़ से अधिक है। इससे पता चलता है कि देश में शिक्षकों की कुल संख्या के आंकड़े से हर स्कूल में उनकी उपलब्धता का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
एक शिक्षक को अगर कई कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाना पड़े, दोपहर के भोजन की व्यवस्था देखनी पड़े और प्रशासनिक काम भी संभालना पड़े, तो हर बच्चे को पर्याप्त समय देना मुश्किल हो जाता है। शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने और समझने की क्षमता विकसित नहीं होती, तो आगे की पढ़ाई भी कठिन होती जाती है। कई बार बच्चे स्कूल तो जाते रहते हैं, लेकिन वास्तविक शिक्षा से दूर होते जाते हैं।
मिड-डे मील, मुफ्त शिक्षा और डिग्री ही काफी नहीं
मिड-डे मील योजना, जिसे अब पीएम पोषण योजना के तहत चलाया जाता है, और मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा बच्चों के लिए जरूरी सहारा हैं। इन योजनाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए। लेकिन पौष्टिक भोजन शिक्षक की कमी पूरी नहीं कर सकता। इसी तरह, फीस माफ होने से परिवहन का खर्च, घर के कामकाज का दबाव या परिवार की आर्थिक परेशानियां खत्म नहीं होतीं।
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार मिलता है। लेकिन यह कानून अपने आप 3 से 18 वर्ष की पूरी आयु के लिए मुफ्त शिक्षा की गारंटी नहीं देता। इसलिए किशोरावस्था में बच्चों को स्कूल में बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सहायता जरूरी है।
स्कूल की पहचान और मान्यता को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है। UDISE कोड किसी स्कूल की पहचान करता है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय के स्पष्टीकरण के अनुसार, केवल इस कोड से स्कूल को मान्यता प्राप्त होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। स्कूल का पंजीकरण, कानूनी मान्यता और कक्षा में शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग बातें हैं।
इसी तरह, शिक्षक की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय होना जरूरी है, लेकिन प्रभावी शिक्षण के लिए सिर्फ प्रमाणपत्र काफी नहीं। शिक्षकों को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, पढ़ाने की सामग्री और बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय भी चाहिए। लगातार खाली पद बने रहने या ऐसी भाषा में पढ़ाए जाने से, जिसे बच्चा ठीक से समझ नहीं पाता, शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति एक ऐसा चक्र भी पैदा कर सकती है जिसमें परिवार फीस वाले निजी स्कूलों की ओर जाने लगते हैं। फिर सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या घटने को शिक्षकों की तैनाती कम करने या स्कूलों को मिलाने का आधार बना दिया जाता है। इस चक्र को तोड़ने के लिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करना जरूरी है। जिन बच्चों के पास निजी स्कूल का विकल्प नहीं है, उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार से हटाई नहीं जा सकती।
समस्या का एक कारण यह भी है कि स्कूलों में अलग-अलग कामों की जिम्मेदारी अलग-अलग अधिकारियों के पास होती है। कोई शिक्षक भर्ती करता है, कोई इमारत की मरम्मत देखता है और कोई बजट जारी करता है, लेकिन इन सबके बीच प्रधानाध्यापक से हर समस्या का जवाब मांगा जाता है। राजनीतिक व्यवस्था में नई घोषणाओं को जितना महत्व मिलता है, उतना ध्यान अक्सर रखरखाव पर नहीं दिया जाता। नतीजा यह होता है कि परिवारों को सरकारी स्कूल एक अविश्वसनीय सेवा लगने लगते हैं।
बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों से क्या सीखें?
ASER के आंकड़ों में पंजाब और मिजोरम के सरकारी स्कूलों के पांचवीं कक्षा के बच्चों का पढ़ने का प्रदर्शन बेहतर दिखाई देता है। इन राज्यों में क्रमशः 66 प्रतिशत और 65.9 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे।
केरल में तीसरी कक्षा के बच्चों की पढ़ने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया, जबकि सिक्किम में आठवीं कक्षा के बच्चों के पढ़ने के स्तर में सुधार देखा गया। इन उदाहरणों को संबंधित क्षेत्रों की खास उपलब्धियों के रूप में देखना चाहिए, न कि पूरे शिक्षा तंत्र के हर पहलू में उत्कृष्टता का प्रमाण मान लेना चाहिए।
केरल का KITE कार्यक्रम भी एक महत्वपूर्ण सीख देता है। इसमें तकनीकी सुविधाओं के साथ शिक्षकों का प्रशिक्षण, शैक्षणिक सामग्री और उपकरणों के रखरखाव पर ध्यान दिया जाता है। किसी स्कूल में कंप्यूटर या अन्य उपकरण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि उनकी देखभाल और सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी तय हो।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव है। लेकिन साक्षरता दर, परीक्षा परिणाम और शानदार इमारतों को शिक्षा की गुणवत्ता का एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह है कि बच्चे कितना सीख रहे हैं और उन्हें रोजाना किस तरह की शिक्षा मिल रही है।
जब नागरिकों ने कैमरा सरकारी स्कूलों की ओर घुमाया
15 अगस्त 2026 को अभिजीत दिपके के नेतृत्व में शुरू हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को सार्वजनिक जवाबदेही का मुद्दा बनाया। महाराष्ट्र से शुरू हुए इस अभियान के तहत नागरिकों ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में स्कूलों की स्थिति का जायजा लिया।
टूटे शौचालयों, खराब कक्षाओं और भोजन की साफ-सफाई से जुड़ी समस्याओं के वीडियो सामने आने से उन स्थितियों पर भी ध्यान गया जो अक्सर सरकारी फाइलों तक सीमित रह जाती हैं। अभियान ने माता-पिता के सामने एक सीधा सवाल रखा: क्या अधिकारी अपने बच्चों को भी ऐसी परिस्थितियों में पढ़ने भेजना स्वीकार करेंगे?
अभियान के दौरान कुछ प्रशासनिक कदम भी सामने आए। हरियाणा ने करीब 2,800 चिन्हित विकास कार्यों के लिए 130 करोड़ रुपये जारी किए। उत्तर प्रदेश ने स्कूलों के बुनियादी ढांचे और साफ-सफाई से जुड़ी 14 बिंदुओं की जांच सूची जारी की।
हालांकि, इन कदमों को केवल इसी अभियान का परिणाम मानना सही नहीं होगा। इनके पीछे व्यापक जनदबाव और पहले से चल रही प्रशासनिक प्रक्रियाओं की भी भूमिका हो सकती है। किसी घटना के बाद कोई फैसला होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि फैसला केवल उसी घटना के कारण लिया गया।
जयपुर के पास रामपुरा कंवरपुरा में स्कूल की असुरक्षित इमारत की जगह नया भवन बनाने के लिए 18 लाख रुपये मंजूर किए गए और सितंबर में पुरानी इमारत को गिराने का काम शुरू हुआ। लेकिन इस राशि के एक हिस्से को लेकर निर्णय अभियान से पहले ही हो चुका था। राजस्थान में स्कूलों की मरम्मत से जुड़ी कुछ बड़ी घोषणाएं भी अभियान से पहले की थीं।
इसलिए अभियान की सबसे स्पष्ट उपलब्धि स्कूलों की समस्याओं को सामने लाना और कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ाना है। पूरे देश में सीखने के स्तर में सुधार हुआ है या नहीं, यह साबित करने के लिए अभी ठोस आंकड़ों की जरूरत है। असली परीक्षा यह होगी कि मरम्मत के काम पूरे हों, सुविधाएं लगातार काम करें और बच्चों की उपस्थिति में सुधार आए।
सरकारी अधिकारियों को स्कूलों की निगरानी और जांच के लिए नागरिकों को अवसर देना चाहिए, लेकिन बच्चों की निजता और पढ़ाई के समय की सुरक्षा भी जरूरी है। पारदर्शिता के लिए स्पष्ट नियम, व्यवस्थित जांच और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध निष्कर्ष जरूरी हैं।
दाखिले बढ़ाने के साथ बच्चों को स्कूल में बनाए रखना भी जरूरी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का लक्ष्य 2030 तक प्री-स्कूल से लेकर माध्यमिक स्तर तक 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात हासिल करना है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार, नई शिक्षा नीति की संरचना के तहत कक्षा 9 से 12 तक का सकल नामांकन अनुपात 71.7 प्रतिशत दर्ज किया गया। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी काफी काम करना बाकी है।
सकल नामांकन अनुपात यानी GER की गणना में किसी शिक्षा स्तर पर दाखिला लेने वाले सभी उम्र के विद्यार्थियों की कुल संख्या की तुलना उस स्तर के लिए निर्धारित आधिकारिक आयु वर्ग की आबादी से की जाती है। यह अनुपात 100 प्रतिशत से अधिक भी हो सकता है। इसलिए केवल GER से यह साबित नहीं होता कि उस आयु वर्ग के सभी बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं या सही ढंग से सीख रहे हैं।
सरकार की नीतियों में सुधार के कई जरूरी उपाय पहले से मौजूद हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सुलभ स्कूलों, प्रशिक्षित शिक्षकों, परिवहन या छात्रावास की सुविधाओं और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की पहचान पर जोर देती है। नीति आयोग की 2026 की कार्ययोजना में भी बच्चों के स्कूल छोड़ने के शुरुआती संकेतों की पहचान, एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाने की निगरानी, पढ़ाई में आई कमी को दूर करने वाले विशेष पाठ्यक्रम और समय पर छात्रवृत्ति देने जैसे उपाय शामिल हैं।
अब सबसे बड़ी चुनौती इन नीतियों को जमीन पर लागू करने की है। हर उस बच्चे की पहचान होनी चाहिए जो स्कूल से बाहर है या नियमित रूप से नहीं आ रहा। इसके बाद यह समझना जरूरी है कि उसके सामने कौन-सी बाधा है और उसे दूर करने के लिए कितने संसाधनों की जरूरत होगी। केवल दाखिला बढ़ाने का अभियान चलाने और बाद में बच्चों की स्थिति पर ध्यान नहीं देने से सरकारी रिकॉर्ड तो बेहतर हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा की असली समस्या बनी रहेगी।
2030 तक सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए 10 जरूरी कदम
भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अगले कुछ वर्षों में ऐसे कदम उठाने होंगे जिनका असर हर स्कूल और हर बच्चे तक पहुंचे।
1. आसपास के स्कूल तक पहुंच सुरक्षित बनाएं। वर्ष 2027 तक राज्यों को प्रस्तावित स्कूल विलय की स्थिति में यह सार्वजनिक करना चाहिए कि बच्चों को किस स्कूल में जाना होगा, वहां पहुंचने में कितनी दूरी तय करनी पड़ेगी, परिवहन की क्या व्यवस्था होगी और स्थानीय लोगों से किस तरह चर्चा की गई। जहां भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्कूलों का विलय बच्चों को शिक्षा से दूर कर सकता है, वहां छोटे स्कूलों को बनाए रखना चाहिए।
2. एक शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूलों की समस्या खत्म करें। स्कूलों में खाली पदों की जानकारी सार्वजनिक की जाए और वास्तविक जरूरत के अनुसार भर्ती की जाए। वर्ष 2028 तक भर्ती, शिक्षकों की उचित तैनाती और वैकल्पिक शिक्षकों की व्यवस्था के जरिए ऐसी स्थिति खत्म करने का लक्ष्य होना चाहिए जिसमें स्कूल पूरी तरह एक शिक्षक पर निर्भर हों। दूरदराज के क्षेत्रों में तैनात शिक्षकों के लिए आवास, प्रोत्साहन और पेशेवर सहयोग भी जरूरी है।
3. शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने और गणित सीखने को प्राथमिकता दें। बच्चों के लिए रोजाना पढ़ने और गणित का अभ्यास करने का पर्याप्त समय तय हो। नियमित रूप से प्रत्येक बच्चे की सीखने की क्षमता का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर छोटे समूहों में अतिरिक्त सहायता दी जाए। निपुण भारत मिशन के 2026-27 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रयास तेज किए जाएं। वर्ष 2030 तक हर साल स्वतंत्र रूप से जांचे गए परिणाम प्रकाशित हों। बच्चों को अपमानित करने या अंकों में हेरफेर करने के बजाय वास्तविक सुधार पर ध्यान दिया जाए।
4. पहली कक्षा से पहले मजबूत नींव तैयार करें। आंगनवाड़ी और स्कूलों के बीच बेहतर तालमेल बनाकर प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से खेल-आधारित शुरुआती शिक्षा दी जाए। बच्चों को उनकी घरेलू भाषा में समझ विकसित करने का अवसर मिले और धीरे-धीरे दूसरी भाषाओं से परिचित कराया जाए। प्री-स्कूल को कम उम्र में ही पाठ्यपुस्तकों को रटने की जगह नहीं बनाया जाना चाहिए।
5. स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं हमेशा चालू हालत में रहें। वर्ष 2027 तक स्कूलों की इमारतों, पेयजल, शौचालय, बिजली और दिव्यांग बच्चों के लिए पहुंच की स्वतंत्र जांच पूरी की जाए। मरम्मत की समयसीमा और जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक हों। हर साल रखरखाव के लिए अलग बजट रखा जाए, ताकि शौचालय इस्तेमाल करने योग्य रहें और मरम्मत के बाद छत सुरक्षित बनी रहे। गर्मी, बाढ़ और चक्रवात जैसी आपदाओं से निपटने की तैयारी भी स्कूलों का हिस्सा होनी चाहिए।
6. स्कूल जाना आर्थिक रूप से आसान बनाएं। मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य जांच और सरकारी सुविधाओं का लाभ समय पर मिलना सुनिश्चित किया जाए। जहां जरूरत सबसे ज्यादा है, वहां नाश्ते की व्यवस्था बढ़ाई जाए। आर्थिक रूप से कमजोर किशोरों के लिए परिवहन और पढ़ाई के जरूरी खर्चों में मदद दी जाए। सहायता परिवारों तक समय पर पहुंचे, ताकि खर्च के कारण बच्चों को पढ़ाई छोड़नी न पड़े। जरूरत के मुताबिक विशेष शिक्षक, सहायक उपकरण और सुलभ परिवहन भी उपलब्ध कराया जाए।
7. एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाने के दौरान बच्चों पर नजर रखें। लगातार अनुपस्थित रहने वाले बच्चों और कक्षा 5 से 6, कक्षा 8 से 9 तथा कक्षा 10 से 11 में दाखिले के दौरान पढ़ाई छोड़ने वाले विद्यार्थियों की मदद के लिए जिम्मेदार कर्मचारी तय किए जाएं। दूसरे राज्यों में काम करने वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए राज्यों के बीच तालमेल हो। पढ़ाई में पिछड़ चुके बच्चों के लिए विशेष कक्षाएं और दोबारा दाखिला लेने की आसान व्यवस्था हो, जिसमें अनावश्यक दस्तावेजों की बाधा न बने।
8. शिक्षकों को पढ़ाने के लिए जरूरी सहयोग दें। जिला स्तर के शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत बनाया जाए और कक्षा में पढ़ाने के तरीकों पर नियमित मार्गदर्शन मिले। शिक्षकों को लिपिकीय और तकनीकी काम में सहयोग, उचित स्थानांतरण नीति और पर्याप्त शिक्षण सामग्री दी जाए। उनके काम का आकलन केवल परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि कक्षा में शिक्षण की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की प्रगति से किया जाए। इसमें स्कूलों की शुरुआती स्थिति को भी ध्यान में रखा जाए। शिक्षकों को बिना इंटरनेट के इस्तेमाल होने वाली डिजिटल सामग्री के बारे में प्रशिक्षण दिया जाए और बच्चों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
9. समुदाय को स्कूलों की निगरानी का अधिकार दें। स्कूल प्रबंधन समितियों को बजट, बुनियादी सुविधाओं और बच्चों को मिलने वाली शैक्षणिक सहायता की समीक्षा करने में सक्षम बनाया जाए। हर शैक्षणिक सत्र में सार्वजनिक सुनवाई हो और शिकायतों के निपटारे की समयसीमा तय हो। नागरिकों की भागीदारी से स्कूलों की जांच की व्यवस्था बनाई जाए, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और निजता का पूरा ध्यान रखा जाए। राजनीतिक दलों या सरकारों के प्रभाव से अलग, सभी जगह समान मानक लागू होने चाहिए।
10. शिक्षा के लिए पर्याप्त बजट और परिणामों की स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करें। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP का 6 प्रतिशत खर्च करने के राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य की दिशा में केंद्र और राज्यों के बीच स्पष्ट वित्तीय योजना बनाई जाए। गरीब और दूरदराज के क्षेत्रों के स्कूलों को अतिरिक्त सहायता दी जाए। खर्च, शिक्षकों की उपलब्धता, बच्चों के सीखने के स्तर और पढ़ाई पूरी करने से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। वर्ष 2028 और 2030 में स्वतंत्र समीक्षा कर यह पता लगाया जाए कि सुधार के प्रयास कितने सफल हुए।
एक कक्षा, एक वादा
भारत की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारना संभव है, क्योंकि देश में पहले से काम कर रहे संस्थान, समर्पित शिक्षक और सुधार के कई उदाहरण मौजूद हैं। निराशा का सबसे अच्छा जवाब यही है कि इन सफलताओं को हर गांव, हर कस्बे और हर मोहल्ले तक पहुंचाया जाए।
गांव का स्कूल वह जगह है जहां गणतंत्र का वादा वास्तविक रूप लेता है। यह उस शिक्षक में दिखाई देता है जो समय पर कक्षा में पहुंचता है, उस भोजन में जो बच्चों को सम्मान के साथ परोसा जाता है, उस किताब में जिसे बच्चा समझ पाता है और उस सवाल में जिसे पूछने के लिए उसे प्रोत्साहित किया जाता है।
वर्ष 2030 तक हर बच्चे को इस भरोसे के साथ कक्षा में प्रवेश करने का अवसर मिलना चाहिए कि वहां कोई उसकी सीखने में मदद करेगा। देश के विकास का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब यह भरोसा हर बच्चे को मिले।
लेखक परिचय: प्रो. उज्ज्वल के. चौधरी पहले अदामास और टेक्नो इंडिया विश्वविद्यालयों में प्रो-वाइस चांसलर, वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में उपाध्यक्ष तथा एमिटी और सिम्बायोसिस विश्वविद्यालयों में डीन रह चुके हैं।




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