भारत की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। लंबे समय से रटकर पढ़ने और केवल डिग्री हासिल करने पर केंद्रित व्यवस्था में अब व्यावसायिक शिक्षा और कौशल आधारित प्रशिक्षण को तेजी से शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य युवाओं को केवल डिग्रीधारी बनाने के बजाय उन्हें रोजगार के लिए जरूरी कौशल से लैस करना है।
चुनौती कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा रोजगार से जुड़े आंकड़ों से लगाया जा सकता है। अलग-अलग अनुमानों में स्नातकों की बेरोजगारी दर 51 से 57 प्रतिशत के बीच बताई गई है। मार्च 2026 में युवाओं की बेरोजगारी दर 15.2 प्रतिशत रही, जो 2025 में 13.8 प्रतिशत थी। हालांकि, मई 2026 तक देश की कुल बेरोजगारी दर घटकर 5.5 प्रतिशत हो गई थी।
‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट इस तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने रखती है। 2023 में 20 से 29 वर्ष की उम्र के बेरोजगार भारतीयों में करीब दो-तिहाई स्नातक थे। 2017 में यह आंकड़ा आधे से भी कम था। इतना ही नहीं, जिन स्नातकों को नौकरी मिलती है, उनमें केवल 6.7 प्रतिशत ही स्थायी वेतन वाली नौकरियों तक पहुंच पाते हैं।
हालांकि, समस्या के साथ बदलाव की कुछ उम्मीद जगाने वाली तस्वीर भी सामने आई है। भारत में कौशल विकास के लिए पिछले कुछ वर्षों में तैयार किए गए ढांचे और किए गए निवेश का असर अब दिखाई देने लगा है।
व्यावसायिक प्रशिक्षण में तेजी से बढ़ी भागीदारी
भारत की कामकाजी उम्र वाली आबादी में किसी न किसी तरह का व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण लेने वालों की हिस्सेदारी 2017-18 में 8.1 प्रतिशत थी। 2023-24 तक यह बढ़कर 34.7 प्रतिशत हो गई। यानी केवल छह वर्षों में इसमें चार गुना से अधिक वृद्धि हुई।
यह सामान्य गति से हुई वृद्धि नहीं है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद कौशल और व्यावसायिक शिक्षा के लिए किए गए लगातार प्रयासों का असर दिखाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 2025 तक 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया था।
नीति के क्रियान्वयन की विभिन्न समीक्षाओं में राज्यों में बुनियादी शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों में महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। हालांकि, 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ने का लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।
अप्रेंटिसशिप में बढ़ा दायरा, लेकिन चुनौतियां भी
एक समय भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अप्रेंटिसशिप यानी काम के साथ प्रशिक्षण की व्यवस्था सीमित स्तर पर थी। अब इसका दायरा काफी बढ़ा है, हालांकि राज्यों और क्षेत्रों के बीच इसकी भागीदारी अभी समान नहीं है।
PM-NAPS योजना के तहत अब तक 43 लाख से अधिक अप्रेंटिस प्रशिक्षण से जुड़ चुके हैं। यह कार्यक्रम 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 51,000 से अधिक संस्थानों तक पहुंच चुका है।
इनमें 3.4 लाख से अधिक अप्रेंटिस को IT और डिजिटल क्षेत्र से जुड़े ट्रेड में प्रशिक्षण मिला है। करीब 2,000 लोगों को उभरते AI से जुड़े कामों में भी रखा गया है। यह दिखाता है कि भारत का कौशल विकास ढांचा नई तकनीकों और भविष्य के रोजगार क्षेत्रों की जरूरतों के अनुसार खुद को बदल सकता है।
लेकिन अप्रेंटिसशिप का विकास लगातार एक जैसा नहीं रहा। 2025 में NAPS के तहत आवेदन घटकर करीब 4.02 लाख रह गए, जो छह साल का सबसे निचला स्तर था। 2022 में यह संख्या 42.8 लाख के उच्च स्तर पर थी। यानी तीन वर्षों में आवेदन 90 प्रतिशत से ज्यादा घट गए। इससे पता चलता है कि लगातार प्रयास और बेहतर क्रियान्वयन के बिना युवाओं और संस्थानों की भागीदारी बनाए रखना मुश्किल है।
फरवरी 2026 में जारी नीति आयोग की समीक्षा में भी इस चुनौती का उल्लेख किया गया। वित्त वर्ष 2024-25 में NAPS के तहत 13.09 लाख अप्रेंटिस पंजीकृत हुए, लेकिन इनमें केवल करीब 19 प्रतिशत ही अपना प्रशिक्षण पूरा कर पाए। भागीदारी कुछ चुनिंदा राज्यों में काफी अधिक केंद्रित रही। अकेले गुजरात की हिस्सेदारी राष्ट्रीय NAPS गतिविधियों में करीब एक चौथाई थी, जबकि ज्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संयुक्त हिस्सेदारी राष्ट्रीय स्तर पर बेहद कम रही।
हालांकि, इसके बाद स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं। मासिक स्टाइपेंड को 6,800 रुपये से बढ़ाकर 12,300 रुपये तक करने और छोटे अनुपालन उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने जैसे सुधारों के बाद वित्त वर्ष 2025-26 में NAPS पंजीकरण बढ़कर 30.6 लाख के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 49.3 प्रतिशत अधिक था।
एक और सकारात्मक बदलाव यह है कि छोटे और मध्यम उद्योग अब अप्रेंटिसशिप से जुड़ने वाले संस्थानों की सबसे बड़ी श्रेणी बन गए हैं। कुल भागीदारी में इनकी हिस्सेदारी 25.35 प्रतिशत रही। यह संकेत देता है कि भारत का कौशल विकास अभियान अब केवल बड़ी और चर्चित कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन छोटे और मध्यम कारोबारों तक भी पहुंच रहा है, जहां बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है।
अब कौशल और रोजगार के बीच मजबूत संबंध जरूरी
आर्थिक सर्वेक्षण में शामिल राष्ट्रीय कौशल अंतर अध्ययन केवल समस्या की पहचान तक सीमित नहीं है। यह यह भी बताता है कि आगे किन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इनमें बुनियादी कौशल को मजबूत करना और शिक्षा के पाठ्यक्रम को रोजगार बाजार की जरूरतों से बेहतर तरीके से जोड़ना प्रमुख हैं।
यह स्पष्टता अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रगति है। आज भारत के पास अपने कौशल संबंधी अंतर को समझने के लिए वह विस्तृत जानकारी उपलब्ध है, जो एक दशक पहले नहीं थी।
आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, भारत की करीब 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, लेकिन केवल 51.25 प्रतिशत युवा ही रोजगार योग्य कौशल रखने वाले माने जाते हैं। ऐसे में कौशल आधारित शिक्षा को मजबूत करना रोजगार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
देश के करीब 14 करोड़ स्नातकों से जुड़े आंकड़े भी विश्वविद्यालयों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इनके आधार पर उच्च शिक्षा संस्थान ऐसे पाठ्यक्रम तैयार कर सकते हैं जो केवल डिग्री हासिल करने के बजाय वास्तविक रोजगार की जरूरतों को ध्यान में रखते हों।
डिग्री के साथ अनिवार्य हो सकता है कौशल प्रशिक्षण
आगे की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। स्नातक डिग्री के भीतर व्यावसायिक मॉड्यूल को अनिवार्य और क्रेडिट आधारित बनाया जा सकता है। राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क के माध्यम से छात्रों को व्यावसायिक डिप्लोमा और अकादमिक डिग्री के बीच आसानी से आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है, ताकि उन्हें जीवनभर किसी एक शिक्षा धारा तक सीमित न रहना पड़े।
उद्योगों की भूमिका भी बढ़ानी होगी। सेक्टर स्किल काउंसिल के माध्यम से कंपनियों को पाठ्यक्रम तैयार करने में अधिक सक्रिय भूमिका दी जा सकती है। IT, डिजिटल ट्रेड और AI से जुड़े अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों में दिखाई दे रही गतिविधियां इस दिशा में आगे बढ़ने का आधार बन सकती हैं।
छोटे और मध्यम उद्योगों में अप्रेंटिसशिप को और बढ़ाने के लिए स्टाइपेंड सहायता जारी रखने और नियमों को सरल बनाने की जरूरत होगी। इससे मौजूदा 43 लाख से अधिक संचयी अप्रेंटिस की संख्या को आगे बढ़ाया जा सकता है।
इसके साथ ही राज्यों के बीच अप्रेंटिसशिप की भागीदारी में मौजूद बड़े अंतर को कम करना भी जरूरी है। फिलहाल राष्ट्रीय भागीदारी का बड़ा हिस्सा कुछ ही राज्यों में केंद्रित है। दूसरे राज्यों में सक्रिय पहुंच और जागरूकता बढ़ाकर इस असंतुलन को कम किया जा सकता है।
जर्मनी और स्विट्जरलैंड से सीख सकता है भारत
अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी भारत के लिए उपयोगी हो सकता है। जर्मनी और स्विट्जरलैंड में ‘ड्युअल एजुकेशन सिस्टम’ के तहत कम उम्र से ही औपचारिक शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण को जोड़ा जाता है। वहां अप्रेंटिसशिप में भागीदारी भारत के मौजूदा स्तर से कई गुना अधिक है।
इन देशों में व्यावसायिक योग्यता को सामाजिक सम्मान के मामले में विश्वविद्यालय की डिग्री से कम नहीं माना जाता। भारत में भी धीरे-धीरे यह सोच बदल रही है कि केवल विश्वविद्यालय की डिग्री ही बेहतर करियर का रास्ता है।
भारत में व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण में भागीदारी बढ़ रही है और इससे जुड़े सफल उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय की डिग्री और कौशल आधारित शिक्षा के बीच पुराना अंतर धीरे-धीरे कम हो सकता है।
भारत के युवाओं के रोजगार की स्थिति की वैश्विक तुलना भी बताती है कि पिछले वर्षों में शिक्षा में नामांकन तेजी से बढ़ा है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता उसी गति से नहीं बढ़ पाई है।
यही वह अंतर है, जहां व्यावसायिक शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसका उद्देश्य केवल ज्यादा डिग्रियां हासिल करना नहीं, बल्कि बढ़ती शिक्षा को वास्तविक रोजगार और बेहतर आजीविका के अवसरों में बदलना होना चाहिए।




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