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छात्रों के आइडिया को बिजनेस में बदल रहे विश्वविद्यालयों के इनक्यूबेशन सेंटर, लेकिन बाजार और फंडिंग अब भी चुनौती

भारत के विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान अब केवल कक्षा में पढ़ाई तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे छात्रों को अपने नए विचारों और तकनीकी समाधानों को कारोबार में बदलने में भी मदद कर रहे हैं। इसके लिए संस्थानों में इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं, जहां छात्रों और नए उद्यमियों को लैब, मेंटरशिप और उत्पाद विकसित करने के अवसर मिलते हैं।

हालांकि, किसी नए और संभावनाशील आइडिया को सफल और टिकाऊ कारोबार में बदलने के लिए केवल तकनीकी समाधान तैयार करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उद्योग का अनुभव, ग्राहक, बाजार की समझ और वित्तीय सहायता भी जरूरी होती है।

इसलिए संस्थानों के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि उन्होंने कितने इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए हैं। असली सवाल यह है कि शुरुआती आइडिया तैयार होने के बाद क्या ये सेंटर संस्थापकों को उन संसाधनों और विशेषज्ञों से जोड़ पा रहे हैं, जिनकी उन्हें कारोबार आगे बढ़ाने के लिए जरूरत है।

कक्षा के आइडिया को बाजार तक पहुंचाना जरूरी

IIT पटना के BioNEST Incubation Centre में सहायता पाने वाले स्टार्टअप्स में करीब 40 प्रतिशत छात्र हैं। सेंटर के चीफ मैनेजर कुमार सिद्धार्थ सिंह के अनुसार, इनमें कई छात्र IIT पटना से ही जुड़े हैं। उनके पाठ्यक्रम और तकनीकी प्रशिक्षण से उन्हें शुरुआती विचार विकसित करने में मदद मिलती है, जिसे बाद में इनक्यूबेशन सेंटर के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है। हालांकि, 40 प्रतिशत का यह आंकड़ा सिंह का अनुमान है और इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

सिंह ने बायोनिक हाथ विकसित करने वाले एक शुरुआती स्टार्टअप का उदाहरण दिया। यह दिखाता है कि तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण से मिले ज्ञान को किसी वास्तविक उत्पाद में बदला जा सकता है।

BioNEST Incubation Centre का काम ऐतिहासिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग तथा मेडिकल टेक्नोलॉजी पर केंद्रित रहा है। सेंटर उत्पाद विकसित करने के लिए जरूरी उपकरण और लैब सुविधाएं उपलब्ध कराता है। एजुकेशन टेक्नोलॉजी अब तक इसका प्रमुख क्षेत्र नहीं रहा है, हालांकि सेंटर ने अपनी गतिविधियों का दायरा बढ़ाना शुरू किया है।

लेकिन किसी उत्पाद को तैयार करना कारोबार शुरू करने की पूरी प्रक्रिया नहीं है। संस्थापकों को बाजार में मांग समझने, संभावित ग्राहकों की पहचान करने और उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने की रणनीति तैयार करने की भी जरूरत होती है।

सिंह के अनुसार, संस्थानों के बीच सीमित सहयोग की वजह से कई बार तकनीकी विशेषज्ञों को कारोबारी जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ती हैं, जबकि बिजनेस पर ध्यान देने वाले संस्थापकों को तकनीकी मदद हासिल करने में परेशानी होती है।

सिंह ने कहा कि उन्हें लगता है कि इनक्यूबेटर और संस्थान कई बार अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे हैं और उनके बीच पर्याप्त सहयोग नहीं है।

उन्होंने IIT पटना के इंजीनियरों और AIIMS पटना के डॉक्टरों के बीच सहयोग को मेडिकल टेक्नोलॉजी से जुड़े काम का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। अस्पतालों और अन्य विश्वविद्यालयों के साथ ऐसे व्यापक संबंध स्टार्टअप संस्थापकों को उन लोगों के करीब ला सकते हैं, जो उनके उत्पादों का वास्तविक इस्तेमाल करेंगे। इससे उन्हें ऐसी व्यावहारिक समस्याओं की पहचान करने में भी मदद मिल सकती है, जिनका समाधान बाजार में उपयोगी हो।

क्षेत्रीय स्तर पर इनक्यूबेशन सपोर्ट मजबूत करने की जरूरत

मजबूत संस्थागत सहयोग की जरूरत केवल किसी एक विश्वविद्यालय या कैंपस तक सीमित नहीं है। IIM Bangalore के NSRCEL की CEO रसिका प्रशांत के अनुसार, देश में इनक्यूबेशन सेंटरों की संख्या बढ़ने के साथ उनके सहयोग और सुविधाओं को भी मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों में उद्यमियों की वास्तविक जरूरतों को समझना जरूरी है।

प्रशांत के अनुसार, अच्छे स्टार्टअप मजबूत संस्थापकों से बनते हैं, लेकिन मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए मजबूत संस्थानों की जरूरत होती है।

उन्होंने कहा कि उद्यमिता के लिए सहायता पारंपरिक कक्षा में पढ़ाई से अलग होती है। अलग-अलग संस्थापकों का अनुभव और उनकी जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए इनक्यूबेशन सेंटरों को सभी के लिए एक ही कार्यक्रम लागू करने के बजाय जरूरत के अनुसार मार्गदर्शन देने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

NSRCEL स्टार्टअप संस्थापकों को सहायता देने के साथ अन्य इनक्यूबेशन सेंटरों को भी बुनियादी ढांचे, रणनीति और कार्यक्रम तैयार करने में मदद करता है।

छोटे शहरों के स्टार्टअप की चुनौतियां अलग

किसी स्टार्टअप की भौगोलिक स्थिति भी यह तय करती है कि उसे किस तरह की सहायता की जरूरत होगी। छोटे शहर में काम करने वाले संस्थापक को बाजार, नियम-कानून और भाषा से जुड़ी ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जो किसी बड़े स्टार्टअप केंद्र में मौजूद संस्थापक के सामने नहीं होतीं।

प्रशांत के अनुसार, NSRCEL टियर-2 और टियर-3 शहरों के उद्यमियों के साथ भी काम करता है और उनकी कारोबारी जरूरत के अनुसार उन्हें संबंधित कर्मचारियों और विशेषज्ञों से जोड़ता है। संगठन की टीम में अलग-अलग भारतीय भाषाएं बोलने वाले लोग भी शामिल हैं।

NSRCEL कुछ सामग्री को स्थानीय यानी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी प्रयोग कर रहा है। प्रशांत ने इसे छात्रों के लिए कोई लर्निंग प्रोडक्ट या अलग स्किलिंग कार्यक्रम नहीं बताया। इनक्यूबेशन के संदर्भ में इसका उद्देश्य संगठन से जुड़े लोगों तक जरूरी जानकारी को अधिक आसानी से पहुंचाना है।

फंडिंग जरूरी, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं

स्टार्टअप के लिए वित्तीय सहायता भी महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल फंडिंग मिलने से तकनीकी और कारोबारी जरूरतें पूरी नहीं हो जातीं।

SBI Foundation की असिस्टेंट मैनेजर अवनी एसआर ने अपने इंटरव्यू में चर्चा की गई पहल के संदर्भ में बताया कि फाउंडेशन लंबी अवधि के लक्ष्यों और तय फंडिंग मानकों के आधार पर वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

अवनी ने स्पष्ट किया कि फाउंडेशन की भूमिका वित्तीय सहायता तक सीमित है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस पहल में फिलहाल शिक्षा से जुड़े स्टार्टअप्स को शामिल नहीं किया गया है। इसलिए इस फंडिंग को एजुकेशन टेक्नोलॉजी से जुड़े स्टार्टअप्स में निवेश के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

आइडिया से बाजार तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती

अब असली चुनौती यह है कि जब कोई छात्र एक अच्छा और संभावनाशील आइडिया विकसित कर लेता है, तो उसके बाद क्या होता है। किसी उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने के लिए टेस्टिंग सुविधाओं, उद्योग विशेषज्ञों और संभावित ग्राहकों तक पहुंच महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इसलिए विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में इनक्यूबेशन सेंटरों की सफलता केवल नए स्टार्टअप की संख्या से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि ये सेंटर छात्रों और संस्थापकों को तकनीकी ज्ञान से आगे बढ़कर बाजार, उद्योग, ग्राहक और वित्तीय संसाधनों से कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाते हैं।

Raish Ahmed

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