छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) डिजिटल सबूतों की जांच के लिए एक अहम केंद्र बनकर उभरी है। यहां टूटे हुए मोबाइल फोन, लॉक आईफोन, लैपटॉप और धुंधले सीसीटीवी फुटेज की जांच के साथ डीपफेक फोटो और वीडियो की भी पड़ताल की जा रही है। लैब में अब तक 1,200 से अधिक मोबाइल फोन और लैपटॉप की जांच हो चुकी है, जबकि 130 से ज्यादा डिवाइस की जांच के बाद रिपोर्ट जारी की गई है।
मध्य भारत में सिंथेटिक मीडिया की पहचान के लिए इस तरह की सुविधा शुरू किए जाने का दावा किया जा रहा है। इस तकनीक के जरिए यह पता लगाने की कोशिश होती है कि किसी फोटो, वीडियो या ऑडियो में कृत्रिम तरीके से बदलाव किया गया है या नहीं। इसके लिए विशेषज्ञ तस्वीरों के पिक्सल, रोशनी और परछाई, होंठों की हरकत, आवाज के पैटर्न और डिजिटल फाइल के मेटाडेटा की जांच करते हैं।
डिजिटल सबूतों की अहमियत बढ़ने के साथ रायपुर की इस लैब का काम भी बढ़ा है। पुलिस के अलावा आईटी, सीबीआई, ईडी, एनआईए, डीआरआई और एनसीबी जैसी केंद्रीय एजेंसियां भी जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच के लिए इसकी मदद ले रही हैं। इससे जांच के लिए कुछ डिवाइस को दूसरे केंद्रों तक भेजने की जरूरत कम हो सकती है।
टूटे मोबाइल से लॉक आईफोन तक, डेटा निकालना बड़ी चुनौती
आपराधिक मामलों में मोबाइल फोन, टैबलेट, लैपटॉप और पेनड्राइव जैसे उपकरण अहम सबूत बन सकते हैं। इनमें मौजूद चैट, तस्वीरें, वीडियो, कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल जानकारी किसी मामले की जांच में मदद कर सकती है। लेकिन इन सबूतों तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता।
अधिकारियों के मुताबिक, कई मामलों में पुलिस के पास डिवाइस का पासवर्ड या पैटर्न लॉक नहीं होता। खासकर आईफोन जैसे उपकरणों में सुरक्षा व्यवस्था के कारण डेटा तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। इसके बावजूद रायपुर की लैब में टूटे हुए और पानी से खराब हुए मोबाइल सहित अलग-अलग तरह के उपकरणों की जांच की जा रही है।
विशेषज्ञों की कोशिश रहती है कि डिवाइस में मौजूद डिजिटल जानकारी को सुरक्षित रखते हुए जरूरी डेटा हासिल किया जाए। व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप की चैट तथा फेसबुक और इंस्टाग्राम से जुड़े उपलब्ध डिजिटल डेटा की भी जांच की जाती है। हालांकि, हर डिवाइस से पूरा डेटा निकाल पाना संभव नहीं होता। यह उपकरण की स्थिति, उसके सुरक्षा सिस्टम और डेटा के उपलब्ध होने पर निर्भर करता है।
डीपफेक की पहचान कैसे करते हैं विशेषज्ञ?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किए गए नकली फोटो, वीडियो और ऑडियो की पहचान करना अब डिजिटल फोरेंसिक की बड़ी चुनौती है। ऐसे कंटेंट में किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या होंठों की हरकत इस तरह बदली जा सकती है कि पहली नजर में असली और नकली के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाए।
रायपुर की फोरेंसिक लैब में मल्टीमीडिया फोरेंसिक के जरिए फोटो और वीडियो की अलग-अलग स्तरों पर जांच की जाती है।
पिक्सल जांच: तस्वीर में चेहरे के किनारों, त्वचा और दूसरे हिस्सों में असामान्य धुंधलेपन या बदलाव के संकेत तलाशे जाते हैं। इससे संभावित एडिटिंग का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
रोशनी और परछाई का मिलान: चेहरे पर पड़ने वाली रोशनी और बनने वाली परछाई की तुलना वीडियो के आसपास के दृश्य से की जाती है। इनके बीच असामान्य अंतर होने पर विशेषज्ञ आगे जांच करते हैं।
लिप-सिंक जांच: वीडियो में व्यक्ति के होंठों की हरकत और सुनाई देने वाली आवाज का फ्रेम-दर-फ्रेम मिलान किया जाता है। दोनों के बीच अंतर मिलने पर यह देखा जाता है कि कहीं ऑडियो और वीडियो को अलग-अलग तो नहीं बदला गया।
ऑडियो स्पेक्ट्रोग्राम: आवाज की आवृत्ति और उसके पैटर्न का विश्लेषण किया जाता है। सांस लेने, आवाज में ठहराव और पीछे सुनाई देने वाली दूसरी आवाजों जैसे संकेतों की भी जांच हो सकती है।
मेटाडेटा की पड़ताल: डिजिटल फाइल में उपलब्ध तारीख, डिवाइस और इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर से जुड़ी जानकारी देखी जाती है। इससे फाइल के स्रोत और उसमें संभावित बदलावों के बारे में सुराग मिल सकते हैं।
हालांकि, किसी एक संकेत के आधार पर फोटो या वीडियो को डीपफेक घोषित नहीं किया जा सकता। जांच में कई तरह के तकनीकी संकेतों को एक साथ देखना जरूरी है। मेटाडेटा में बदलाव किया जा सकता है और सोशल मीडिया पर अपलोड होने के बाद फाइल की मूल जानकारी भी बदल सकती है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष के लिए उपलब्ध डिजिटल सबूतों और अन्य तथ्यों का मिलान महत्वपूर्ण होता है।
केंद्र सरकार से 80 करोड़ रुपये मिलने की तैयारी
लैब की सुविधाओं को और बेहतर बनाने के लिए नए सॉफ्टवेयर खरीदने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, केंद्र सरकार से क्षमता बढ़ाने के लिए 80 करोड़ रुपये मिलने की बात है। इस राशि से डीपफेक की जांच के लिए महंगे फोरेंसिक सॉफ्टवेयर और एआई आधारित पहचान उपकरण खरीदे जाने की योजना है।
इन तकनीकों से डिजिटल सामग्री की जांच अधिक व्यवस्थित तरीके से करने में मदद मिल सकती है। खासकर ऐसे मामलों में, जहां वीडियो या ऑडियो को सबूत के तौर पर पेश किया जाता है और उसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठते हैं।
हालांकि, प्रस्तावित राशि की मंजूरी, जारी होने और उसके इस्तेमाल की मौजूदा स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। इसी तरह, नए सॉफ्टवेयर की खरीद और उनके इस्तेमाल की समयसीमा भी संबंधित विभाग की जानकारी से स्पष्ट होगी।
18 देशों में दोबारा जांच के दावे से चर्चा में लैब
लैब के अधिकारियों के मुताबिक, यहां तैयार की गई फोरेंसिक रिपोर्टों को 18 देशों में दोबारा जांच के लिए भेजा गया था और वहां से मिली रिपोर्टों के निष्कर्ष रायपुर की रिपोर्ट से मेल खाते थे। इस दावे के आधार पर लैब की जांच क्षमता को लेकर चर्चा हुई है।
हालांकि, इन रिपोर्टों का स्वतंत्र सत्यापन, संबंधित देशों और मामलों का विवरण तथा जांच करने वाली संस्थाओं की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने पर ही इस दावे का व्यापक आकलन किया जा सकता है। किसी रिपोर्ट के निष्कर्षों का दूसरी जांच से मेल खाना और उसे किसी देश की अदालत में औपचारिक रूप से स्वीकार किया जाना अलग-अलग बातें हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों में डिजिटल फोरेंसिक सुविधाओं की उपलब्धता और क्षमता अलग-अलग हो सकती है। रायपुर की लैब में इस तरह की जांच होना उसे क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनाता है, लेकिन दूसरे राज्यों की सुविधाओं से तुलना करने के लिए समान मानकों पर आधारित आंकड़ों की जरूरत होगी।
डिजिटल सबूतों की विश्वसनीयता क्यों अहम है?
आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया किसी भी आपराधिक जांच में अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन डिजिटल सामग्री को सबूत के रूप में इस्तेमाल करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उसमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई, डेटा कहां से आया और जांच के दौरान उसकी मूल स्थिति सुरक्षित रही या नहीं।
फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए सिर्फ डेटा निकालना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता है कि सबूत किस उपकरण से मिला, उसे किस तरह संभाला गया और जांच की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड उपलब्ध है। इससे अदालत में डिजिटल सबूतों की विश्वसनीयता परखने में मदद मिलती है।
रायपुर की राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में बढ़ती जांच क्षमता ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब डीपफेक और डिजिटल धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में असली और नकली सामग्री के बीच अंतर करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। आने वाले समय में आधुनिक उपकरणों, प्रशिक्षित विशेषज्ञों और पारदर्शी जांच प्रक्रियाओं के साथ यह सुविधा पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए और उपयोगी साबित हो सकती है।
टीएल चंद्रा, संयुक्त संचालक, राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), रायपुर के मुताबिक, लैब में टूटे मोबाइल फोन से लेकर धुंधले सीसीटीवी फुटेज और डीपफेक सामग्री तक की जांच की जा रही है।




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