संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की सरकारी समर्थन वाली स्वच्छ ऊर्जा कंपनी मसदर (Masdar) ने 2013 से प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए हैं। इसके साथ ही कंपनी ने ब्रिटेन के बड़े समुद्री पवन ऊर्जा संयंत्रों में भी हिस्सेदारी खरीदी है। इसी तरह, सऊदी अरब की कंपनी एसीडब्ल्यूए पावर (ACWA Power) ने उज्बेकिस्तान से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक सौर ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण से जुड़ी परियोजनाएं विकसित की हैं।
यूएई और सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल हैं। अब ये देश अपने ऊर्जा क्षेत्र के अनुभव का इस्तेमाल अपनी सीमाओं से बाहर भी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में कर रहे हैं। इन परियोजनाओं की एक दिलचस्प बात यह है कि इनके लिए निवेश और वित्तपोषण का कोई एक तय तरीका नहीं अपनाया गया है।
अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग-अलग वित्तीय मॉडल
2013 से 2026 के बीच मंजूर या शुरू की गई ऐसी 20 विदेशी सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि मसदर और एसीडब्ल्यूए पावर ने इनके विकास, वित्तपोषण या हिस्सेदारी खरीदने में अलग-अलग तरीके अपनाए। इन परियोजनाओं के मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि इनका खर्च किसने उठाया और इसके लिए क्या शर्तें तय की गईं।
इन 20 परियोजनाओं में से 13 का खर्च यूएई सरकार ने अनुदान या कम ब्याज वाले ऋण के जरिये उठाया। इनमें से ज्यादातर राशि अबू धाबी फंड फॉर डेवलपमेंट से मिली। इन परियोजनाओं में मसदर ने सरकार की ओर से विकासकर्ता की भूमिका निभाई। बाकी सात परियोजनाएं व्यावसायिक समझौतों के तहत आगे बढ़ाई गईं।
पहले सरकारी सहायता से बनी परियोजनाओं को देखें। प्रशांत महासागर और कैरेबियाई क्षेत्र के लिए 5-5 करोड़ अमेरिकी डॉलर के दो अलग-अलग फंड बनाए गए। इनके जरिये नाउरू, किरिबाती, वानुआतु, माइक्रोनेशिया, बारबाडोस, बहामास और दूसरे द्वीपीय देशों में छोटे नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र लगाए गए। इनमें से ज्यादातर सौर ऊर्जा संयंत्र हैं।
इनमें से अधिकांश संयंत्रों की क्षमता 2.5 मेगावाट से कम है। ऊर्जा उद्योग के लिहाज से ये छोटे संयंत्र हैं, लेकिन द्वीपीय देशों की बिजली व्यवस्था के लिए इनका महत्व काफी अधिक है। मिस्र और मॉरिटानिया में इससे बड़ी परियोजनाएं भी लगाई गईं। वहीं, सेशेल्स में 5 मेगावाट क्षमता का सौर ऊर्जा पार्क कम ब्याज वाले ऋण से तैयार किया गया।
इन परियोजनाओं के पीछे की वजह समझना मुश्किल नहीं है। कई छोटे द्वीपीय देश बिजली बनाने के लिए विदेशों से डीजल मंगाते हैं। इससे वहां बिजली उत्पादन बहुत महंगा पड़ता है। मसदर के अनुमान के मुताबिक, 2014 में घोषित प्रशांत क्षेत्र की पांच परियोजनाओं से हर साल कुल 12 लाख लीटर से अधिक डीजल की बचत हो सकती थी।
बहामास की राजधानी नासाउ में राष्ट्रीय स्टेडियम में लगभग 40 लाख अमेरिकी डॉलर की लागत से 925 किलोवाट क्षमता वाला सौर ऊर्जा कारपोर्ट बनाया गया है। मसदर इसे बहामास की पहली बड़े स्तर की सौर ऊर्जा परियोजना बताती है। यह संयंत्र अब स्थानीय बिजली ग्रिड को बिजली दे रहा है।
व्यावसायिक परियोजनाओं में निवेश का अलग तरीका
व्यावसायिक परियोजनाओं का तरीका इससे अलग है। मसदर ने इंग्लैंड के तट से दूर स्थित 630 मेगावाट क्षमता वाले लंदन एरे विंड फार्म में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी। इसके बाद 2014 में कंपनी ने नॉरफॉक के तट के पास स्थित डजियन विंड फार्म में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए करीब 52.5 करोड़ पाउंड का भुगतान किया।
मसदर ने इन निवेशों के पीछे ब्रिटेन के बड़े समुद्री पवन ऊर्जा बाजार को प्रमुख वजह बताया। कंपनी ने मोंटेनेग्रो और अमेरिका में पहले से चल रहे पवन ऊर्जा संयंत्रों में भी हिस्सेदारी खरीदी।
अध्ययन में शामिल एसीडब्ल्यूए पावर की दोनों परियोजनाओं में सौर ऊर्जा के साथ ऊर्जा भंडारण की व्यवस्था भी है। उज्बेकिस्तान की ताशकंद रिवरसाइड परियोजना में 200 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्र और 500 मेगावाट-घंटे (MWh) क्षमता की बैटरी लगाई गई है। एसीडब्ल्यूए पावर के अनुसार, यह मध्य एशिया की सबसे बड़ी बैटरी भंडारण परियोजना है। इसकी कुल लागत 53.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर है।
इस परियोजना के लिए छह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने कुल 38.6 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ऋण दिया। इनमें यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट और इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक भी शामिल हैं। इस संयंत्र से 25 साल तक उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को बिजली बेची जाएगी।
दक्षिण अफ्रीका में एसीडब्ल्यूए पावर की बोकोपोर्ट परियोजना में 20.04 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह सौर तापीय ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें गर्मी को नौ घंटे तक जमा करके रखा जा सकता है। इस वजह से सूर्यास्त के बाद भी बिजली उत्पादन जारी रखना संभव होता है। इस परियोजना से दक्षिण अफ्रीका की सरकारी बिजली कंपनी एस्कॉम (Eskom) को 20 साल के समझौते के तहत बिजली बेची जाती है।
निवेश के तरीकों से सामने आए कई अहम रुझान
इन परियोजनाओं को सरकारी सहायता और व्यावसायिक निवेश के आधार पर अलग-अलग देखने पर कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। सबसे पहले, परियोजना में इस्तेमाल होने वाली तकनीक का चुनाव काफी हद तक निवेश के स्रोत पर निर्भर करता है।
20 में से 15 परियोजनाएं सौर ऊर्जा से जुड़ी हैं। सरकारी सहायता से बनी लगभग सभी परियोजनाओं में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया गया है। इसके उलट, मसदर ने जिन चार पवन ऊर्जा परियोजनाओं में हिस्सेदारी खरीदी, वे सभी व्यावसायिक निवेश के तहत आती हैं।
इन परियोजनाओं के पीछे बताई गई वजहें भी अलग-अलग हैं। 11 परियोजनाओं के विवरण में विदेशों से आयात किए जाने वाले ईंधन की ऊंची कीमत का जिक्र है। ये सभी सरकारी सहायता वाली परियोजनाएं हैं। वहीं, व्यावसायिक निवेश उन देशों में किया गया जहां नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर स्पष्ट लक्ष्य और बिजली खरीदने की सरकारी व्यवस्था मौजूद है। उदाहरण के लिए, उज्बेकिस्तान ने 2030 तक अपनी कुल बिजली का 40 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा से हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसी तरह, ब्रिटेन समुद्री पवन ऊर्जा के बड़े बाजारों में शामिल है।
हालांकि, इन दोनों तरह की परियोजनाओं में एक समानता भी है। दोनों कंपनियों को सरकारी समर्थन हासिल है। मसदर का मालिकाना हक अबू धाबी सरकार से जुड़ी संस्थाओं के पास है, जबकि सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड एसीडब्ल्यूए पावर का सबसे बड़ा शेयरधारक है। अध्ययन में शामिल हर परियोजना साझेदारी के आधार पर तैयार की गई। इनमें विकास फंड, अन्य परियोजना कंपनियों या अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने भी भागीदारी की।
इन परियोजनाओं के घोषित उद्देश्य सस्ती बिजली उपलब्ध कराना, ऊर्जा तक लोगों की पहुंच बढ़ाना और प्रदूषण फैलाने वाली गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना हैं। सरकारी सहायता वाली परियोजनाएं छोटे देशों के साथ लंबे समय तक संबंध बनाने में भी मदद कर सकती हैं। यूएई के अधिकारी इस बात को खुलकर स्वीकार कर चुके हैं। उनका कहना है कि विदेशों में नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश भविष्य में व्यापक कारोबारी संबंधों की नींव तैयार कर सकता है।
शोधकर्ताओं ने इस निवेश को खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को लंबे समय में विविध बनाने की कोशिश से भी जोड़ा है। इन परियोजनाओं के पूरे लाभ खाड़ी देशों और उन देशों के लिए आने वाले वर्षों में और स्पष्ट होंगे, जहां ये संयंत्र लगाए गए हैं।
भारत के लिए भी इस निवेश मॉडल में अहम संकेत
भारत इस अध्ययन में शामिल नहीं था, लेकिन यहां की परिस्थितियां व्यावसायिक निवेश के मॉडल से काफी मेल खाती हैं। भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, देश में नवीकरणीय ऊर्जा से बनने वाली बिजली खरीदने के लिए बड़े स्तर पर नीलामी भी होती है। यही वे परिस्थितियां हैं, जिन्होंने उज्बेकिस्तान जैसे देशों में खाड़ी क्षेत्र की कंपनियों के व्यावसायिक निवेश को आकर्षित किया।
2019 में मसदर ने भारत की सौर और पवन ऊर्जा कंपनी हीरो फ्यूचर एनर्जीज में करीब 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था। अध्ययन में शामिल पवन ऊर्जा परियोजनाओं में सीधे संयंत्रों की हिस्सेदारी खरीदी गई थी, जबकि भारत में मसदर ने एक पूरी कंपनी में हिस्सेदारी हासिल की।
भारत का जुड़ाव दूसरे मॉडल से भी है। उसने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) की स्थापना में भागीदारी की है और विकासशील तथा द्वीपीय देशों के साथ सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अपने स्तर पर सहयोग बढ़ाया है। भारत, फ्रांस और यूएई ने तीसरे देशों में ऊर्जा परियोजनाओं पर मिलकर काम करने पर भी सहमति जताई है।
इससे भविष्य में दोनों निवेश मॉडल के एक साथ आने की संभावना बनती है। इसमें खाड़ी देशों की वित्तीय ताकत, भारत की विनिर्माण क्षमता और मसदर का छोटे द्वीपीय देशों में ऊर्जा संयंत्र लगाने का अनुभव एक साथ काम आ सकता है।
खाड़ी देशों का अनुभव यह भी बताता है कि किसी दूरदराज के द्वीप पर डीजल की जगह सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए दिया गया अनुदान और यूरोप के किसी पवन ऊर्जा संयंत्र में हिस्सेदारी खरीदना दो बिल्कुल अलग तरह के निवेश हैं। इसलिए दोनों का आकलन भी अलग-अलग आधार पर होना चाहिए। सरकारी सहायता वाली परियोजना को इस आधार पर परखना चाहिए कि उससे कितने डीजल की बचत हुई और कितने लोगों तक बिजली पहुंची। वहीं, व्यावसायिक निवेश का मूल्यांकन उससे मिलने वाले आर्थिक लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस नजरिये से देखें तो अध्ययन में शामिल खाड़ी देशों का नवीकरणीय ऊर्जा निवेश वास्तव में दो अलग-अलग रणनीतियों का मेल है। दोनों रणनीतियां उन देशों की जरूरतों के हिसाब से बनाई गई हैं, जहां ये परियोजनाएं शुरू की गईं। इन दोनों को एक ही मॉडल मानने से सरकारी सहायता और व्यावसायिक निवेश के बीच का अंतर छिप जाता है।
कुल मिलाकर, ये परियोजनाएं दिखाती हैं कि खाड़ी देश अपने ऊर्जा क्षेत्र के अनुभव और वित्तीय ताकत का इस्तेमाल दुनिया भर में स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं। यह प्रयास छोटे द्वीपीय देशों के बिजली ग्रिड से लेकर दुनिया के बड़े पवन ऊर्जा बाजारों तक फैला हुआ है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि खाड़ी देश वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अपनी नई भूमिका बना रहे हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वे जीवाश्म ईंधन उद्योग में अपनी पारंपरिक भूमिका को तुरंत छोड़ रहे हैं। इसके बजाय, वे ऊर्जा क्षेत्र में अपनी मौजूदा स्थिति के साथ स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।




Add comment