स्कूल में अच्छे अंक लाना और पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करना ही किसी छात्र की सफलता का पूरा पैमाना नहीं है। उसका आत्मविश्वास, मानसिक शांति और पढ़ाई के प्रति उत्साह भी उतना ही जरूरी है। देशभर के स्कूली छात्रों पर किए गए एक नए सर्वे में लड़कियों की भावनात्मक स्थिति को लेकर कुछ ऐसे ही सवाल सामने आए हैं।
IC3 इंस्टीट्यूट और काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) की ओर से संयुक्त रूप से जारी स्टूडेंट वेल-बीइंग पल्स रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, लड़कियां लड़कों की तुलना में स्कूल में खुद को ज्यादा खुश महसूस करती हैं, लेकिन आत्मविश्वास, मानसिक शांति और प्रेरणा के मामले में वे पीछे हैं। इतना ही नहीं, लड़कियों ने लड़कों के मुकाबले चिंता और हताशा जैसी भावनाएं भी अधिक महसूस करने की बात कही है।
देशभर के 8,515 छात्रों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित इस सर्वे में छात्राओं और छात्रों के भावनात्मक अनुभवों की तुलना की गई है। इसके नतीजे बताते हैं कि स्कूल में खुश रहना और भावनात्मक रूप से मजबूत महसूस करना दो अलग-अलग बातें हैं।
स्कूल में खुश हैं लड़कियां, लेकिन आत्मविश्वास में पीछे
रिपोर्ट के अनुसार, 62 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे अक्सर या हमेशा स्कूल में खुश महसूस करती हैं। लड़कों में ऐसा कहने वालों की संख्या 58 प्रतिशत रही। यानी स्कूल में खुशी महसूस करने के मामले में लड़कियां लड़कों से आगे हैं।
लेकिन आत्मविश्वास के सवाल पर तस्वीर बदल जाती है। सर्वे में केवल 52 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे अक्सर या हमेशा आत्मविश्वास महसूस करती हैं। लड़कों में यह आंकड़ा 64 प्रतिशत रहा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 22 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि वे शायद ही कभी या कभी भी आत्मविश्वास महसूस नहीं करतीं। लड़कों में ऐसा कहने वालों की संख्या 14 प्रतिशत है।
ये आंकड़े बताते हैं कि स्कूल के माहौल में खुश रहने के बावजूद कई छात्राएं खुद पर भरोसा करने और अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त महसूस करने में कठिनाई का सामना कर रही हैं।
मानसिक शांति और पढ़ाई के प्रति उत्साह में भी अंतर
सर्वे में छात्राओं और छात्रों के बीच मानसिक शांति के स्तर में भी अंतर सामने आया है। केवल 42 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे अक्सर या हमेशा शांत और तनावमुक्त महसूस करती हैं। लड़कों में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत रहा।
वहीं, 28 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि वे शायद ही कभी या कभी भी शांत महसूस नहीं करतीं। लड़कों में ऐसा कहने वालों की संख्या 22 प्रतिशत रही।
पढ़ाई और रोजमर्रा के कामों को लेकर प्रेरणा के मामले में भी लड़कियां पीछे नजर आईं। रिपोर्ट के मुताबिक, 55 प्रतिशत लड़कियां अक्सर या हमेशा किसी काम को करने के लिए प्रेरित महसूस करती हैं, जबकि लड़कों में यह आंकड़ा 61 प्रतिशत है।
इससे साफ है कि छात्राओं के लिए केवल स्कूल का अच्छा माहौल पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसा वातावरण भी चाहिए, जहां वे बिना दबाव के अपनी बात रख सकें और अपनी क्षमताओं पर भरोसा कर सकें।
लड़कियों में चिंता और हताशा की भावना ज्यादा
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू छात्राओं में नकारात्मक भावनाओं का बढ़ता स्तर है। सर्वे के अनुसार, 33 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि वे अक्सर या हमेशा चिंता महसूस करती हैं। लड़कों में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत है।
इसी तरह, 36 प्रतिशत लड़कियों ने बार-बार हताशा या निराशा महसूस करने की बात कही। लड़कों में ऐसा महसूस करने वालों की संख्या 28 प्रतिशत रही।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लड़कियां लड़कों की तुलना में कम ऊर्जा और उदासी महसूस करने की बात अधिक कहती हैं। हालांकि, इन दोनों भावनाओं के लिए रिपोर्ट में अलग-अलग प्रतिशत का उल्लेख नहीं किया गया है।
इन नतीजों से पता चलता है कि छात्राओं को पढ़ाई और स्कूल की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी भावनात्मक परेशानियों से भी जूझना पड़ रहा है।
स्कूलों के लिए क्या संकेत देती है यह रिपोर्ट?
इस सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि छात्रों की स्थिति को केवल उनके परीक्षा परिणाम, उपस्थिति और स्कूल में प्रदर्शन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह भी जानना जरूरी है कि वे खुद को कितना सुरक्षित, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से शांत महसूस करते हैं।
स्कूलों में काउंसलिंग की बेहतर व्यवस्था, शिक्षकों के साथ खुलकर बातचीत का अवसर और ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है, जहां छात्र बिना किसी डर या झिझक के अपनी समस्याएं साझा कर सकें।
खासतौर पर छात्राओं के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाली गतिविधियां, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सहायता उपयोगी हो सकती है। अभिभावकों को भी बच्चों की भावनाओं और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सर्वे में सामने आए आंकड़े छात्रों की खुद बताई गई भावनाओं पर आधारित हैं। रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती कि लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी, चिंता या निराशा के पीछे कौन-से कारण जिम्मेदार हैं। इसलिए इन अंतरों को किसी एक वजह से जोड़ना सही नहीं होगा।
अच्छे अंक ही नहीं, छात्रों की मानसिक स्थिति भी हो स्कूलों की प्राथमिकता
IC3-CISCE की यह रिपोर्ट स्कूलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल छात्रों को अच्छे अंक दिलाना और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करना नहीं होना चाहिए। बच्चों का भावनात्मक विकास और मानसिक स्वास्थ्य भी शिक्षा का अहम हिस्सा है।
लड़कियों का स्कूल में ज्यादा खुश महसूस करना सकारात्मक संकेत है, लेकिन आत्मविश्वास, प्रेरणा और मानसिक शांति में पीछे रहना चिंता का विषय है। स्कूलों, शिक्षकों और अभिभावकों को इन पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।
छात्रों की वास्तविक सफलता तभी संभव है, जब वे पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के साथ खुद पर भरोसा करना, तनाव से निपटना और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करना भी सीखें।




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