सुप्रीम कोर्ट ने पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर बैंक (2026) मामले में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के फैसलों को रद्द कर दिया। इसकी वजह यह थी कि इन फैसलों में कुछ ऐसे न्यायिक मामलों के फैसलों का हवाला दिया गया था, जो फर्जी थे।
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘कानून के शासन को कमजोर करने’ वाला कदम बताने से भी परहेज नहीं किया। अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार करने का निर्देश दिया।
यह घटना एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के दौर में कानून का कोई विद्यार्थी या पेशेवर ऐसे कानूनी दस्तावेज तैयार कर सकता है, जो देखने में सही लगें, लेकिन उनकी विश्वसनीयता की जांच न की गई हो। यदि AI से तैयार सामग्री को भरोसेमंद कानूनी स्रोतों और न्यायिक फैसलों से मिलाए बिना इस्तेमाल किया जाता है, तो गंभीर गलतियां हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया में AI का इस्तेमाल करते समय हर चरण पर मानवीय निगरानी जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि सोचने-समझने की जिम्मेदारी जरूरत से ज्यादा AI को सौंपने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, खासकर तब जब यह आदत बन जाए।
AI का इस्तेमाल करने से पहले सोचें
तेजी से बदलते कानूनी क्षेत्र में युवा विद्यार्थियों के लिए कानूनी तर्क और विश्लेषण की क्षमता का विकास करना जरूरी है। AI की मदद से तैयार सामग्री कानूनी समझ का पूरी तरह विकल्प नहीं बन सकती।
किसी न्यायिक फैसले को भविष्य के मामलों में मिसाल के रूप में इस्तेमाल करने से पहले वकील को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों की पहचान की जाती है। इसके बाद विवाद से जुड़े कानूनी सवालों को समझा जाता है। फिर फैसले के उस मुख्य कानूनी सिद्धांत को अलग किया जाता है, जिसके आधार पर निर्णय दिया गया, और उन टिप्पणियों से अलग रखा जाता है जो फैसले के लिए जरूरी नहीं थीं। अंत में यह देखा जाता है कि संबंधित फैसला न्यायिक व्यवस्था में पहले से मौजूद अन्य फैसलों के मुकाबले किस स्थान पर है।
इसी तरह, कानून की व्याख्या करते समय उसके शब्दों, संदर्भ, उद्देश्य और संवैधानिक सीमाओं को ध्यान में रखना पड़ता है। सबूतों के मामले में भी यह समझना जरूरी है कि कोई साक्ष्य अदालत में स्वीकार किया जा सकता है या नहीं, वह कितना भरोसेमंद है और मामले के निर्णय में उसका कितना महत्व है।
कानून के विद्यार्थियों के लिए असली चुनौती यह पहचानना है कि AI की मदद से तैयार सामग्री में मानवीय तर्क और विश्लेषण के कौन-से जरूरी पहलू छूट सकते हैं और किन तथ्यों या संदर्भों की दोबारा जांच जरूरी है। केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि AI कितनी जल्दी जवाब तैयार कर सकता है या कितनी तरह की जानकारी दे सकता है।
AI पर निर्भरता से कमजोर हो सकती है सीखने की प्रक्रिया
सोचने और याद रखने से जुड़े कुछ कामों में तकनीक की मदद लेना अपने आप में गलत नहीं है। वकील और कानून के विद्यार्थी लंबे समय से कानूनी डाइजेस्ट, डेटाबेस और संदर्भ पुस्तकों का इस्तेमाल करते आए हैं। इनसे जानकारी खोजने और व्यवस्थित करने में मदद मिलती है।
समस्या तब पैदा होती है, जब आसानी से उपलब्ध और प्रभावशाली भाषा में लिखे गए जवाब को सही, प्रमाणित और लंबे समय तक याद रहने वाले ज्ञान के बराबर मान लिया जाता है। ऐसा करने से बुनियादी मानवीय तर्क और विश्लेषण की क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
सीखने से जुड़े अध्ययनों में ‘जनरेशन इफेक्ट’ और ‘रिट्रीवल प्रैक्टिस’ के महत्व पर जोर दिया गया है। जनरेशन इफेक्ट का मतलब है कि जब विद्यार्थी खुद किसी सवाल का जवाब तैयार करता है, तो सीखने की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है। वहीं, रिट्रीवल प्रैक्टिस में बिना सामग्री देखे पहले सीखी गई जानकारी को याद करने और दोबारा प्रस्तुत करने का अभ्यास किया जाता है।
इसलिए केवल AI से तैयार जवाब पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को खुद सवालों के जवाब लिखने, कानूनी सिद्धांतों को याद करने और उनका अलग-अलग मामलों में इस्तेमाल करने का अभ्यास भी करना चाहिए।
AI से मिले जवाबों के तर्क और तथ्यों की जांच जरूरी
बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के एक हालिया अध्ययन में छह बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) के प्रदर्शन की तुलना विद्यार्थियों के सीखने के स्तर से की गई। लेख में दिए गए अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, इन मॉडलों का प्रदर्शन मोटे तौर पर B+ स्तर के आसपास रहा। सैद्धांतिक विश्लेषण में सुधार दिखा, लेकिन जटिल तथ्यों वाले ऐसे सवालों में उनकी सीमाएं सामने आईं, जिनके उत्तर के लिए संबंधित क्षेत्र के कानून और न्यायिक व्यवस्था की गहरी समझ जरूरी थी।
यह तुलना बताती है कि कानूनी जवाब केवल अच्छी भाषा में लिखे होने से सही नहीं हो जाते। उनमें तथ्यात्मक सटीकता, लागू कानून की सही समझ और विश्वसनीय न्यायिक संदर्भ होना भी जरूरी है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए कानून की पढ़ाई के तरीकों में बदलाव की जरूरत है। विद्यार्थियों को तकनीक का इस्तेमाल करना सिखाने के साथ-साथ उसके जवाबों की जांच करना, गलतियों को पहचानना और स्वतंत्र रूप से कानूनी निष्कर्ष निकालना भी सिखाया जाना चाहिए।
AI सहायक बने, फैसला करने वाला नहीं
कानून की पढ़ाई में AI का संतुलित इस्तेमाल करने के लिए तीन स्तरों पर काम किया जा सकता है।
पहले स्तर पर संदर्भों को निर्धारित प्रारूप में व्यवस्थित करना, शोध की रूपरेखा बनाना, किसी मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में तर्क जुटाना और संभावित परिकल्पनाएं तैयार करना जैसे काम AI की मदद से किए जा सकते हैं।
दूसरे स्तर पर कानूनी सवालों की पहचान करना, न्यायिक फैसलों का विश्लेषण करना, कानून की व्याख्या करना और सबूतों की विश्वसनीयता का आकलन करना जैसे काम आते हैं। ये कानूनी शिक्षा के मूल हिस्से हैं। इसलिए विद्यार्थियों को इनका अभ्यास स्वयं करना चाहिए, ताकि AI की मदद लेने के बावजूद उनकी अपनी सोचने और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित हो सके।
तीसरे स्तर पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि विद्यार्थी AI से मिले जवाबों की स्वतंत्र रूप से जांच करें, उनके आधार को समझें और अंतिम निष्कर्ष की जिम्मेदारी स्वयं लें।
सुप्रीम कोर्ट के 2026 के लिए प्रस्तावित AI उपयोग संबंधी मसौदा नियमों में भी मानवीय निगरानी, AI के काम करने के तरीके को समझने की क्षमता और जवाबदेही जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें AI को सहायक के रूप में देखने पर जोर है, न कि एकमात्र निर्णयकर्ता के रूप में।
कानून की पढ़ाई में मानवीय तर्क की परख जरूरी
कानून की कक्षाओं और परीक्षाओं में विद्यार्थियों की अपनी कानूनी समझ को परखना भी जरूरी है। केवल लिखित उत्तर या तैयार सामग्री के आधार पर उनकी क्षमता का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कानूनी शिक्षा नियम, 2008 में व्यावहारिक प्रशिक्षण को महत्व दिया गया है। इसमें कानूनी सहायता, मूट कोर्ट यानी अदालत की कार्यवाही का अभ्यास, मुकदमे की प्रक्रिया, वकालत के कौशल, मुवक्किलों को कानूनी सलाह देना और मौखिक परीक्षा जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
इन गतिविधियों का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय वास्तविक कानूनी परिस्थितियों को समझने और उनका सामना करने के लिए तैयार करना है।
AI कानूनी शोध और दस्तावेज तैयार करने में मददगार हो सकता है, लेकिन सही तथ्यों की पहचान, कानून की व्याख्या और न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचने की जिम्मेदारी को पूरी तरह तकनीक के हवाले नहीं किया जा सकता। कानून की शिक्षा में तकनीक के लाभों का इस्तेमाल करते हुए मानवीय विवेक, स्वतंत्र सोच और जवाबदेही को बनाए रखना जरूरी है।




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