देश के पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन के खतरे की पहचान और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद ली जाएगी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली एक ऐसा तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, जो भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान करने और उनके जोखिम का आकलन करने में मदद करेगा। इस परियोजना को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की ओर से वित्तीय सहायता दी जा रही है।
इस तकनीक की मदद से पहाड़ी क्षेत्रों का जोखिम मानचित्र तैयार किया जा सकेगा। इससे प्रशासन और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों को उन स्थानों की पहचान करने में आसानी होगी, जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है। समय रहते जोखिम वाले क्षेत्रों की जानकारी मिलने से निगरानी बढ़ाने, लोगों को सतर्क करने और राहत-बचाव की तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
IIT दिल्ली ने इस परियोजना के डिजाइन और विकास के लिए उद्योगों तथा स्टार्टअप कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इसके लिए संस्थान ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी किया है। संस्थान इस परियोजना में मुख्य अन्वेषक (Principal Investigator) की भूमिका निभाएगा, जबकि चयनित उद्योग या स्टार्टअप तकनीक के विकास और उसे लागू करने में सहयोगी संस्थान के रूप में काम करेंगे।
क्या काम करेगा IIT दिल्ली का AI आधारित टूल?
इस प्रस्तावित प्लेटफॉर्म का मुख्य काम अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले भौगोलिक आंकड़ों और AI मॉडल के नतीजों को एक साथ जोड़कर उनका विश्लेषण करना होगा। इसके आधार पर ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जा सकेगी, जहां भूस्खलन होने की आशंका अधिक है।
इसमें जियोस्पेशियल AI (Geospatial AI) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह तकनीक भौगोलिक स्थानों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करके उपयोगी जानकारी निकालने में मदद करती है। इससे पहाड़ों की बनावट, ढलान और जमीन से जुड़े आंकड़ों को समझकर जोखिम वाले स्थानों का आकलन किया जा सकेगा।
IIT दिल्ली की योजना इस तकनीक को एक ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने की है, जहां अलग-अलग AI मॉडल से प्राप्त जानकारी को एक साथ देखा और समझा जा सके।
इंटरैक्टिव मैप और डैशबोर्ड से मिलेगी जानकारी
इस प्लेटफॉर्म पर इंटरैक्टिव नक्शे और डैशबोर्ड उपलब्ध कराने की योजना है। इनके माध्यम से उपयोगकर्ता अलग-अलग क्षेत्रों में भूस्खलन के खतरे की स्थिति देख सकेंगे। जरूरत के अनुसार रिपोर्ट तैयार करने और आंकड़ों के विश्लेषण की प्रक्रिया पर नजर रखने की सुविधा भी दी जाएगी।
इससे आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और विशेषज्ञों को आंकड़ों को समझने तथा उनके आधार पर फैसले लेने में आसानी होगी। किसी क्षेत्र में जोखिम अधिक दिखाई देने पर वहां निगरानी और सुरक्षा से जुड़े इंतजामों को प्राथमिकता दी जा सकेगी।
भूस्खलन के खतरे की पहचान कैसे होगी?
भूस्खलन की आशंका कई प्राकृतिक और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। पहाड़ की ढलान, मिट्टी और चट्टानों की बनावट, जमीन की स्थिति और बारिश जैसे कारक किसी क्षेत्र में भूस्खलन का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
AI आधारित तकनीक इनसे जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करके उन स्थानों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जहां भूस्खलन की आशंका अपेक्षाकृत अधिक है। इस तरह तैयार किए गए जोखिम मानचित्र प्रशासन को यह समझने में मदद करेंगे कि किन इलाकों में विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्र की पहचान करना और किसी खास समय पर भूस्खलन होने की सटीक भविष्यवाणी करना अलग-अलग बातें हैं। प्रस्तावित प्लेटफॉर्म का प्रमुख उद्देश्य जोखिम वाले क्षेत्रों का आकलन और उनकी मैपिंग करना है।
आपदा प्रबंधन और राहत-बचाव की तैयारी में मिलेगी मदद
भारत के हिमालयी राज्यों और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण सड़कें, मकान और दूसरी बुनियादी सुविधाएं प्रभावित होती हैं। कई बार संपर्क मार्ग बंद होने से राहत और बचाव कार्यों में भी देरी होती है। ऐसे में जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान होना काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
IIT दिल्ली का प्रस्तावित प्लेटफॉर्म प्रशासन को संवेदनशील इलाकों की पहचान करने और वहां जरूरी इंतजाम करने में मदद कर सकता है। इसके आधार पर निगरानी बढ़ाने, लोगों को संभावित खतरे के प्रति जागरूक करने और राहत-बचाव संसाधनों की बेहतर योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।
IIT दिल्ली की यह पहल आपदा प्रबंधन में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव प्लेटफॉर्म के विकास, उपलब्ध आंकड़ों की गुणवत्ता और अलग-अलग क्षेत्रों में इसके परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा।




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