Edinbox Hindi

NEET-PG और NEET-SS में बड़ा बदलाव: अब पर्सेंटाइल की जगह रैंक से मिलेगा दाखिला, NMC की मंजूरी

मेडिकल की पोस्टग्रेजुएट (PG) और सुपर स्पेशियलिटी (SS) की पढ़ाई में दाखिले की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो सकता है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने NEET-PG और NEET-SS में मौजूदा पर्सेंटाइल आधारित व्यवस्था की जगह रैंक आधारित मेरिट सिस्टम लागू करने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इस बदलाव के बाद परीक्षा परिणाम में उम्मीदवारों के पर्सेंटाइल की जगह उनकी रैंक घोषित करने का प्रस्ताव है।

इस प्रस्ताव का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की काउंसलिंग प्रक्रिया को आसान बनाना, अलग-अलग चरणों के बीच होने वाली देरी कम करना और तय शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर प्रवेश प्रक्रिया पूरी करना है। हालांकि, अभी इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली है और नए नियमों का मसौदा जारी होना बाकी है। केंद्र सरकार की 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने 3 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए इस बदलाव की जानकारी दी।

NEET-PG और NEET-SS की मौजूदा व्यवस्था में क्या बदलाव होगा?

फिलहाल NEET-PG और NEET-SS में उम्मीदवारों की पात्रता तय करने के लिए पर्सेंटाइल आधारित व्यवस्था लागू है। पर्सेंटाइल से यह पता चलता है कि किसी उम्मीदवार का प्रदर्शन परीक्षा में शामिल अन्य उम्मीदवारों की तुलना में कैसा रहा है। इसी आधार पर काउंसलिंग के लिए न्यूनतम योग्यता तय की जाती है।

अब प्रस्ताव है कि इस व्यवस्था को बदलकर रैंक आधारित मेरिट सिस्टम लागू किया जाए। इसके तहत परीक्षा परिणाम में उम्मीदवारों की रैंक जारी होगी और दाखिले की प्रक्रिया इसी आधार पर आगे बढ़ेगी।

NMC ने 23 सितंबर 2026 की बैठक में इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी। आयोग के सचिव ने 1 अक्टूबर 2026 को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव की जानकारी दी थी। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के अनुसार, नए नियमों का मसौदा जल्द जारी किया जाएगा, जिसके बाद संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अभी रैंक आधारित व्यवस्था लागू नहीं हुई है। जब तक अंतिम नियम अधिसूचित नहीं होते, तब तक मौजूदा व्यवस्था में ही दाखिले की प्रक्रिया चलेगी।

IMA ने प्रस्ताव का स्वागत किया, लेकिन योग्यता से समझौता न करने की दी सलाह

भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने NEET-PG और NEET-SS में रैंक आधारित व्यवस्था लाने के प्रस्ताव का स्वागत किया है। हालांकि, संगठन ने स्पष्ट किया है कि दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव करते समय उम्मीदवारों की योग्यता और मेडिकल शिक्षा के न्यूनतम मानकों से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए।

IMA के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जे. नायक के मुताबिक, मेडिकल शिक्षा का उद्देश्य केवल कॉलेजों की सीटें भरना नहीं है, बल्कि ऐसे योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करना है, जिनके हाथों में मरीजों की जिंदगी की जिम्मेदारी होगी।

उन्होंने कहा कि खाली सीटों को भरने के लिए पात्रता के मानकों में मनमाने तरीके से छूट देना सही नहीं है। किसी उम्मीदवार को केवल इसलिए पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के योग्य नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि किसी कॉलेज में सीट खाली रह गई है।

IMA का मानना है कि रैंक आधारित व्यवस्था से काउंसलिंग में सुधार हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप खाली सीटों की समस्या खत्म नहीं होगी। इसके लिए मेडिकल कॉलेजों और पाठ्यक्रमों से जुड़ी बुनियादी समस्याओं को दूर करना भी जरूरी है।

मेडिकल की PG सीटें खाली रहने की असली वजह क्या है?

देश में मेडिकल की पोस्टग्रेजुएट सीटें खाली रहने का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। हर साल कई सीटें खाली रह जाती हैं और उन्हें भरने के लिए काउंसलिंग के बाद के चरणों में न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल घटाने की जरूरत पड़ती है।

NEET-PG 2025-26 के दाखिला सत्र में भी कटऑफ में बड़ी कमी की गई थी। संशोधित व्यवस्था के तहत सामान्य और EWS वर्ग के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ 7 पर्सेंटाइल, सामान्य दिव्यांग वर्ग के लिए 5 पर्सेंटाइल और SC, ST तथा OBC वर्ग के लिए शून्य पर्सेंटाइल कर दिया गया था। इसके बाद कुछ आरक्षित वर्गों के लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग स्कोर माइनस 40 अंक तक पहुंच गया था। इस फैसले को लेकर मेडिकल शिक्षा के स्तर और उम्मीदवारों की योग्यता पर सवाल उठे थे।

IMA का कहना है कि बार-बार कटऑफ घटाने के बजाय यह पता लगाना जरूरी है कि मेडिकल कॉलेजों की कुछ सीटों पर उम्मीदवार दाखिला लेने से क्यों बचते हैं।

IMA मुख्यालय के वित्त सचिव डॉ. पीयूष जैन ने कहा कि खाली सीटों के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। इनमें जरूरत से ज्यादा फीस, कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की कमी, वजीफे में असमानता और कुछ विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में काम करने की कठिन परिस्थितियां शामिल हैं।

उनके अनुसार, इन समस्याओं को दूर किए बिना केवल पात्रता के मानक कम करने से सीटें भरने की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।

मेडिकल कॉलेजों में किन सुधारों की जरूरत है?

IMA ने मेडिकल कॉलेजों में खाली सीटों की समस्या दूर करने के लिए संस्थानों की सुविधाओं और पढ़ाई से जुड़ी परिस्थितियों में सुधार करने पर जोर दिया है।

सबसे बड़ी समस्या कुछ कॉलेजों में अधिक फीस होना है। निजी मेडिकल कॉलेजों में पोस्टग्रेजुएट पाठ्यक्रमों की फीस कई उम्मीदवारों के लिए आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकती है। ऐसे में छात्र अपनी रैंक के बावजूद कुछ संस्थानों में दाखिला लेने से बचते हैं।

इसके अलावा, मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएं, अस्पताल की सुविधाएं और मरीजों से जुड़ा व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध होना भी जरूरी है। यदि किसी संस्थान में जरूरी सुविधाओं या योग्य शिक्षकों की कमी है, तो वहां पढ़ाई करने को लेकर उम्मीदवारों की रुचि कम हो सकती है।

वजीफे यानी स्टाइपेंड में अंतर भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में रेजिडेंट डॉक्टरों को मिलने वाले वजीफे में काफी अंतर हो सकता है। इसके साथ ही काम का दबाव और कुछ विशेषज्ञता वाले विषयों में बेहतर कार्य परिस्थितियों की कमी भी छात्रों के फैसले को प्रभावित करती है।

IMA ने सुझाव दिया है कि कम पसंद किए जाने वाले विशेषज्ञता वाले विषयों और संस्थानों को बेहतर सुविधाएं देकर अधिक आकर्षक बनाया जाना चाहिए। इसके लिए वजीफे में अंतर कम करना, शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाना और कॉलेजों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना जरूरी है।

12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने भी दिए कई सुझाव

NEET-PG दाखिले की व्यवस्था की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार ने 23 जुलाई 2026 को 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (DGHS) डॉ. लोवनीश जी. कृष्णा ने की। समिति को मौजूदा प्रवेश और काउंसलिंग व्यवस्था की कमियों की पहचान करने और सुधार के व्यावहारिक सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

3 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में रैंक आधारित व्यवस्था के अलावा खाली सीटों की समस्या दूर करने के लिए भी कई सुझाव दिए गए हैं।

समिति ने प्री-क्लिनिकल और पैरा-क्लिनिकल विषयों की फीस क्लिनिकल विषयों की तुलना में कम रखने पर विचार करने की सलाह दी है। एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और माइक्रोबायोलॉजी जैसे विषयों में उम्मीदवारों की रुचि बढ़ाने के लिए यह कदम उपयोगी हो सकता है।

इसके अलावा, इन विषयों में दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों को अनिवार्य सेवा बांड से छूट देने पर भी विचार करने की सिफारिश की गई है। समिति ने मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में सीट रोकने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए उम्मीदवारों के KYC और बायोमेट्रिक सत्यापन की व्यवस्था पर भी विचार करने को कहा है।

इन सुझावों का उद्देश्य केवल सीटें भरना नहीं, बल्कि उन कारणों को दूर करना है जिनकी वजह से उम्मीदवार कुछ विषयों और कॉलेजों को प्राथमिकता नहीं देते।

नई रैंक आधारित व्यवस्था से काउंसलिंग में क्या फायदा होगा?

NMC के प्रस्ताव के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य NEET-PG और NEET-SS की काउंसलिंग प्रक्रिया में होने वाली देरी को कम करना है। अभी अलग-अलग चरणों में सीटें खाली रहने पर न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में बदलाव करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की जरूरत पड़ सकती है।

प्रस्तावित रैंक आधारित व्यवस्था लागू होने पर बाद के काउंसलिंग चरणों में पात्रता पर्सेंटाइल घटाने के लिए अलग से अनुमति लेने की मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव हो सकता है। इससे काउंसलिंग के अलग-अलग चरणों के बीच का समय कम करने और दाखिले की प्रक्रिया को निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

विशेषज्ञ समिति ने मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) की काउंसलिंग प्रक्रिया को अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने पर भी जोर दिया है। इसके तहत प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम करने, मेडिकल कॉलेजों की सीटों की सही जानकारी समय पर उपलब्ध कराने और संबंधित संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की सिफारिश की गई है।

IMA ने भी काउंसलिंग प्रक्रिया को पारदर्शी, एकसमान और समयबद्ध बनाने की मांग की है। संगठन का कहना है कि दाखिले की प्रक्रिया तय समय पर पूरी होनी चाहिए, ताकि छात्रों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े और मेडिकल कॉलेजों में नया शैक्षणिक सत्र समय पर शुरू हो सके।

संगठन ने नए नियमों को अंतिम रूप देने से पहले सभी संबंधित पक्षों से चर्चा करने की जरूरत बताई है। इनमें मेडिकल कॉलेज, शिक्षक, फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और चिकित्सा संगठनों को शामिल करने की मांग की गई है।

क्या रैंक आधारित व्यवस्था से कटऑफ में छूट देने की जरूरत खत्म हो जाएगी?

यह इस प्रस्ताव से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। मौजूदा व्यवस्था में जब पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली रह जाती हैं, तो काउंसलिंग के बाद के चरणों में क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल घटाने का विकल्प अपनाया जाता है। इससे कम अंक पाने वाले उम्मीदवार भी प्रवेश के लिए पात्र हो सकते हैं।

नई व्यवस्था में पर्सेंटाइल की जगह रैंक को आधार बनाने का प्रस्ताव है। इससे काउंसलिंग प्रक्रिया में अलग से कटऑफ घटाने की अनुमति लेने की जरूरत खत्म हो सकती है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि उम्मीदवारों की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शर्त समाप्त हो जाएगी।

IMA ने इस पर विशेष चिंता जताई है। संगठन के अनुसार, पोस्टग्रेजुएट और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने वाले उम्मीदवारों के पास आगे की पढ़ाई और मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी निभाने के लिए जरूरी शैक्षणिक क्षमता होनी चाहिए।

इसलिए नई व्यवस्था में मेरिट के साथ न्यूनतम योग्यता और मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।

NEET-PG और NEET-SS के नए नियम कब लागू होंगे?

फिलहाल NMC ने रैंक आधारित व्यवस्था को केवल सैद्धांतिक मंजूरी दी है। नए नियमों को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। आयोग की ओर से प्रस्तावित नियमों का मसौदा जारी किए जाने के बाद संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी।

मौजूदा प्रस्ताव को 2027 के काउंसलिंग सत्र से लागू करने की दिशा में देखा जा रहा है, लेकिन इसके लिए अंतिम नियमों और जरूरी मंजूरियों का इंतजार करना होगा।

NEET-PG और NEET-SS की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए फिलहाल मौजूदा परीक्षा और प्रवेश नियमों के अनुसार तैयारी जारी रखना जरूरी है। नए नियमों की आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रैंक आधारित व्यवस्था किस तरह लागू होगी और दाखिले की प्रक्रिया में वास्तव में क्या बदलाव आएंगे।

Raish Ahmed

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed