किसी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी जब अपने नए विचारों, उत्पादों या कारोबारी समाधानों के जरिए कंपनी को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं, तो इसे इंट्राप्रेन्योरशिप (Intrapreneurship) कहा जाता है। इसमें कर्मचारी किसी नए कारोबार की शुरुआत करने के बजाय मौजूदा कंपनी के संसाधनों का इस्तेमाल करके नए प्रयोग करते हैं और कारोबार के विकास के अवसर तलाशते हैं।
भारत में इन्फोसिस, रिलायंस इंडस्ट्रीज और टाटा ग्रुप जैसी कंपनियों ने ऐसी पहल शुरू की हैं, जिनके जरिए कर्मचारियों को समस्याओं का समाधान खोजने, नए विचारों पर प्रयोग करने और कारोबार के नए अवसर विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
क्या कभी आपके मन में काम करने का कोई बेहतर तरीका आया है, लेकिन आपने यह सोचकर उसे साझा नहीं किया कि वह आपके काम का हिस्सा नहीं है? कई कंपनियों में कर्मचारियों से पुराने तरीकों के अनुसार काम करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन कुछ कंपनियां चाहती हैं कि कर्मचारी उन तरीकों पर सवाल उठाएं, नए विचार दें और उन्हें कारोबारी अवसरों में बदलने की कोशिश करें।
काम करने के इसी तरीके को इंट्राप्रेन्योरशिप कहा जाता है। इसमें कर्मचारी कंपनी में नौकरी करते हुए भी उद्यमी की तरह सोचते हैं और अपने विचारों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लेते हैं।
इंट्राप्रेन्योरशिप पर Forbes में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, जब कर्मचारियों को अपने विचारों को अमल में लाने के लिए अवसर, जरूरी साधन और सहयोग मिलता है, तो कंपनियां बेहतर नतीजे हासिल कर सकती हैं। इससे कारोबार को ग्राहकों की बदलती जरूरतों और प्रतिस्पर्धा के अनुसार खुद को ढालने में भी मदद मिलती है।
इंट्राप्रेन्योरशिप का अर्थ और परिभाषा
इंट्राप्रेन्योरशिप का मतलब किसी पहले से चल रही कंपनी के भीतर उद्यमी की तरह सोचने और काम करने से है। इंट्राप्रेन्योर ऐसा कर्मचारी होता है, जो किसी समस्या की पहचान करता है, उसका समाधान तैयार करता है और कंपनी के सहयोग से उसे लागू करने की कोशिश करता है।
उदाहरण के लिए, किसी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करने वाला कर्मचारी देखता है कि एक काम पूरा करने में कई घंटे लगते हैं, जबकि किसी नए डिजिटल टूल की मदद से उसे कुछ ही मिनटों में पूरा किया जा सकता है। यदि कंपनी उस कर्मचारी को ऐसा टूल तैयार करने और उसका परीक्षण करने का अवसर देती है, तो वह इंट्राप्रेन्योर की भूमिका निभा रहा है।
इंट्राप्रेन्योरशिप और एंटरप्रेन्योरशिप यानी उद्यमिता के बीच सबसे बड़ा अंतर कारोबार के स्वामित्व और जोखिम का है। उद्यमी आमतौर पर अपना कारोबार शुरू करता है और उसके लिए वित्तीय जोखिम उठाता है। दूसरी ओर, इंट्राप्रेन्योर किसी कंपनी के भीतर रहकर काम करता है। वह नए विचारों को विकसित करने के लिए कंपनी की टीम, तकनीक, वित्तीय संसाधनों और ग्राहकों के नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकता है।
हालांकि, केवल नया विचार आ जाने से उसकी सफलता तय नहीं हो जाती। हर विचार उत्पाद या सेवा में नहीं बदलता। किसी भी विचार को लागू करने से पहले उसका परीक्षण करना, उसकी उपयोगिता का आकलन करना और प्रबंधन का सहयोग हासिल करना जरूरी होता है।
भारतीय कंपनियां इंट्राप्रेन्योरशिप को कैसे बढ़ावा दे रही हैं?
भारत की कई कंपनियों ने ऐसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें कर्मचारियों को नए विचार साझा करने, समाधान आजमाने और कारोबार के नए अवसर विकसित करने का मौका मिलता है।
1. इन्फोसिस: बिजनेस इनक्यूबेटर
इन्फोसिस का बिजनेस इनक्यूबेटर कर्मचारियों को अपने विचारों को संभावित कारोबारी अवसरों में बदलने में मदद करता है। इस तरह की पहल में मार्गदर्शन, वित्तीय सहयोग, नवाचार के लिए जरूरी सुविधाएं और ग्राहकों तक पहुंच जैसे संसाधन शामिल हो सकते हैं।
कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर Be The Navigator पहल का भी उल्लेख है, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों को कारोबारी विचारों में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे पता चलता है कि सही सहयोग मिलने पर कर्मचारी का विचार नए बिजनेस अवसर का रूप ले सकता है।
2. रिलायंस इंडस्ट्रीज: मिशन कुरुक्षेत्र
रिलायंस इंडस्ट्रीज की Mission Kurukshetra पहल के तहत कर्मचारी अपने विचार साझा कर सकते हैं और उन्हें लागू करने की दिशा में हुई प्रगति पर नजर रख सकते हैं। कंपनी के नवाचार कार्यक्रम कर्मचारियों को समस्याओं की पहचान करने, उनके समाधान विकसित करने और कारोबारी प्रक्रियाओं में सुधार लाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
कंपनी की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में भी इस पहल के तहत मूल्यांकन किए गए और लागू किए गए कर्मचारी विचारों का उल्लेख है। यह उदाहरण दिखाता है कि किसी मौजूदा प्रक्रिया में छोटी-सी समस्या का समाधान भी नवाचार की शुरुआत बन सकता है।
3. टाटा ग्रुप: टाटा इनोविस्टा
टाटा इनोविस्टा (Tata InnoVista) टाटा समूह की कंपनियों में विकसित किए गए नए विचारों और तकनीकों को पहचान देने वाला एक समूह-स्तरीय कार्यक्रम है। इसके पुरस्कारों में लागू किए जा चुके नवाचार, पेटेंट प्राप्त तकनीकें और वे परियोजनाएं भी शामिल हैं, जो गंभीर प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो सकीं।
यह कार्यक्रम अलग-अलग टीमों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है और यह भी स्वीकार करता है कि नए प्रयोगों में असफलता की संभावना रहती है। ऐसे प्रयासों से कंपनियों को नए विचार मिल सकते हैं, भले ही हर प्रयोग सफल न हो।
कंपनियों और कर्मचारियों के लिए इंट्राप्रेन्योरशिप के फायदे
इंट्राप्रेन्योरशिप कंपनियों को ग्राहकों की बेहतर सेवा करने, मौजूदा उत्पादों और सेवाओं में सुधार लाने तथा समय और संसाधनों की बर्बादी कम करने के नए तरीके खोजने में मदद कर सकती है। इससे कंपनियां नई तकनीक और प्रतिस्पर्धा के अनुसार खुद को बदल सकती हैं। नए विचारों के लिए उन्हें पूरी तरह बाहरी संस्थाओं पर निर्भर रहने की जरूरत भी कम हो सकती है।
कर्मचारियों के लिए यह अपने काम की जिम्मेदारी लेने, नेतृत्व क्षमता विकसित करने और समस्याओं का समाधान खोजने का व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर है।
हालांकि, इंट्राप्रेन्योरशिप तभी प्रभावी होती है, जब कंपनी वास्तव में कर्मचारियों का सहयोग करे। नए विचारों को विकसित करने के लिए समय, वित्तीय संसाधन, मार्गदर्शन और परीक्षण करने की अनुमति जरूरी है। यदि प्रबंधक हर सुझाव को खारिज कर दें या उचित प्रयास के बाद मिली असफलता पर कर्मचारियों को दंडित करें, तो वे आगे अपने विचार साझा करने से बच सकते हैं।
इंट्राप्रेन्योरशिप और एंटरप्रेन्योरशिप में क्या अंतर है?
| एंटरप्रेन्योरशिप (उद्यमिता) | इंट्राप्रेन्योरशिप |
| अपना स्वतंत्र कारोबार शुरू करना | मौजूदा कंपनी के भीतर नए विचार विकसित करना |
| उद्यमी खुद संसाधन और वित्त जुटाता है | कर्मचारी कंपनी के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है |
| कारोबार का वित्तीय जोखिम आमतौर पर उद्यमी उठाता है | परियोजना का बड़ा हिस्सा जोखिम कंपनी उठा सकती है |
| उद्यमी कारोबार का मालिक या सह-मालिक होता है | स्वामित्व और पुरस्कार कंपनी की नीतियों पर निर्भर करते हैं |
छात्रों और युवा पेशेवरों के लिए इंट्राप्रेन्योरशिप क्यों जरूरी है?
बिजनेस, मैनेजमेंट और मार्केटिंग में करियर बनाने की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए इंट्राप्रेन्योरशिप एक अहम सीख है। नए विचारों और नवाचार के लिए अपना स्टार्टअप शुरू करना जरूरी नहीं है। कोई कर्मचारी किसी कंपनी में काम करते हुए भी उद्यमी की तरह सोच सकता है।
युवा पेशेवर रोजमर्रा के काम में आने वाली समस्याओं को पहचानकर, ग्राहकों की जरूरतों को समझकर और मिले सुझावों पर ध्यान देकर यह सोच विकसित कर सकते हैं। इसके साथ ही, उन्हें व्यावहारिक सुधार सुझाने और अपने विचारों को स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करने का अभ्यास करना चाहिए।
इस तरह, इंट्राप्रेन्योरशिप यह बताती है कि उद्यमी की तरह सोचने और नए अवसर तलाशने के लिए नौकरी छोड़ना जरूरी नहीं है। सही माहौल और सहयोग मिलने पर कर्मचारी अपनी मौजूदा कंपनी के भीतर रहकर भी नए विचारों को कारोबार के विकास में बदलने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।




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