इजरायल में बसने, पढ़ाई जारी रखने और रोजगार पाने के लिए हिब्रू भाषा सीखना बनी मनाशे समुदाय के युवाओं के लिए एक अहम कदम बन गया है। मणिपुर और मिजोरम से इजरायल पहुंचने वाले इस समुदाय के लोगों के सामने नई भाषा सीखने के साथ-साथ शिक्षा, धार्मिक मान्यता और रोजगार से जुड़ी कई चुनौतियां भी हैं।
17 वर्षीय जेसिका (बदला हुआ नाम) मणिपुर से इजरायल आई हैं। उन्होंने 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन अंतिम परीक्षा में शामिल नहीं हो सकीं। अप्रैल 2026 में इजरायल पहुंचने के बाद उन्होंने हिब्रू सीखना शुरू किया, ताकि अपनी पढ़ाई जारी रख सकें और एक नए देश में अपना भविष्य बना सकें। इजरायल पहुंचना उनके सपने के सच होने जैसा था, लेकिन एक साथ कई नई चीजों के साथ तालमेल बिठाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती थी। इनमें हिब्रू भाषा को अच्छी तरह सीखना भी शामिल था।
जेसिका अकेली नहीं हैं। मणिपुर और मिजोरम के बनी मनाशे समुदाय के हजारों लोगों के लिए इजरायल में बसना एक नई शुरुआत की उम्मीद लेकर आता है। हालांकि, अपना देश छोड़कर स्थायी जीवन की ओर बढ़ने के बीच कई बाधाएं हैं। इनमें धार्मिक मान्यता, भाषा सीखना, पढ़ाई में आई रुकावटें और रोजगार तलाशना प्रमुख हैं।
खासकर युवाओं के लिए हिब्रू भाषा सीखना इस बात का अंतर तय कर सकता है कि वे इजरायल में केवल बस पाते हैं या वहां आगे बढ़ने और अपना भविष्य बनाने के अवसर भी हासिल कर पाते हैं।
कौन हैं बनी मनाशे समुदाय के लोग?
बनी मनाशे समुदाय के लोग खुद को बाइबिल में वर्णित मनाशे जनजाति का वंशज मानते हैं। यह उन जनजातियों में से एक है, जिन्हें इजरायल की कथित खोई हुई जनजातियों में गिना जाता है। इस समुदाय के सदस्य पीढ़ियों से यहूदी धर्म की विभिन्न परंपराओं का पालन करते आए हैं। इजरायल ने धार्मिक मान्यता और धर्मांतरण की प्रक्रिया के माध्यम से उनके प्रवास में मदद की है।
2013 में इजरायल पहुंचीं अवियेला बत मनाशे कहती हैं कि बनी मनाशे समुदाय से जुड़े लोगों की धार्मिक प्रक्रिया और देखरेख में यहूदी धार्मिक अदालतों की भूमिका है। वह फिलहाल एक मिकवे में बालानित के रूप में काम करती हैं। मिकवे यहूदी धार्मिक परंपरा में इस्तेमाल होने वाला स्नान स्थल है, जबकि बालानित वहां धार्मिक स्नान की प्रक्रिया की देखरेख करने वाली महिला को कहा जाता है।
अवियेला चाहती हैं कि दिल्ली में रहने वाली उनकी 31 वर्षीय बेटी भी इजरायल आ जाए, ताकि उसे रोजगार और बेहतर जीवन के अवसर मिल सकें। भाषा प्रशिक्षण और किबुत्जिम यानी सामुदायिक बस्तियों में उपलब्ध सीखने के अवसरों के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, “हम भारत में भी पहले से शब्बात मनाते थे। इजरायल आने के बाद समुदाय के लोगों को उलपन इव्रित के माध्यम से हिब्रू भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता है। कोर्स पूरा होने पर प्रमाणपत्र मिलता है, जिससे इजरायल में नौकरी पाने में मदद मिलती है।”
2030 तक इजरायल पहुंच सकते हैं 5,800 लोग
नवंबर 2025 में इजरायली सरकार ने वर्ष 2030 तक बनी मनाशे समुदाय के शेष लगभग 5,800 सदस्यों को इजरायल लाने की योजना को मंजूरी दी थी। योजना के पहले चरण में 2026 के अंत तक 1,200 लोगों के पहुंचने की बात थी। इसके बाद अगले चार वर्षों में अन्य समूहों को भी इजरायल लाए जाने की उम्मीद है।
अवियेला बताती हैं, “नवंबर 2026 के पहले सप्ताह में साक्षात्कार का आखिरी सप्ताह होगा। मैं सिफारिश के लिए दिल्ली में एक रब्बी की तलाश कर रही हूं।”
इस प्रस्तावित प्रवास का दायरा एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—इजरायल पहुंचने के बाद इन परिवारों का भविष्य कैसा होगा? बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितनी जल्दी हिब्रू सीख पाते हैं, अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं और इजरायली समाज में अपनी जगह बना पाते हैं।
जेसिका के लिए पढ़ाई जारी रखना पहली प्राथमिकता
इजरायल पहुंचने के बाद जेसिका नॉफ हागालिल के एक पुनर्वास केंद्र में रह रही थीं, जहां वह हिब्रू भाषा की कक्षाएं भी ले रही थीं। उनकी पहली प्राथमिकता अपनी पढ़ाई पूरी करना है। इसके बाद वह राष्ट्रीय सेवा में शामिल होने की उम्मीद रखती हैं। फिलहाल, अपने इन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए हिब्रू सीखना उनके लिए जरूरी कदम है।
हिब्रू सीखने की चुनौती को कम करके आंकना आसान है। अंग्रेजी के विपरीत, हिब्रू भाषा दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है और इसमें 22 अक्षरों की वर्णमाला का इस्तेमाल होता है। सामान्य तौर पर छपे हुए शब्दों में स्वर चिह्न नहीं दिए जाते। ऐसे में नए विद्यार्थियों के लिए अपरिचित शब्दों को पढ़ना मुश्किल हो सकता है, जब तक कि वे उनकी वर्तनी और उच्चारण से परिचित न हो जाएं। इसके अलावा, हिब्रू की व्याकरण व्यवस्था और क्रियाओं के रूप भी अलग हैं।
जेसिका के मुताबिक, जो विद्यार्थी कई वर्षों तक किसी दूसरी भाषा में पढ़ाई करते रहे हैं, उनके लिए इस बदलाव को अपनाना काफी मुश्किल हो सकता है। किसी पाठ को समझना अलग बात है, जबकि शिक्षक के सवाल का आत्मविश्वास से जवाब देना, परीक्षा देना या कक्षा में तेजी से चल रही चर्चा को समझना अलग चुनौती है। भाषा सीखने की गति हर विद्यार्थी के लिए अलग होती है। यह उसकी उम्र, पहले से सीखी गई भाषाओं, पढ़ाई की गहनता और कक्षा के बाहर अभ्यास के अवसरों पर निर्भर करती है।
जेसिका जैसे विद्यार्थियों के लिए यह चुनौती केवल बातचीत करना सीखने तक सीमित नहीं है। हिब्रू वह भाषा है, जिसके माध्यम से उन्हें इजरायल की शिक्षा व्यवस्था में आगे बढ़ना है और अपनी पढ़ाई के अगले चरण के लिए तैयार होना है।
वह कहती हैं कि असली सवाल यह है कि पुनर्वास के दौरान मिलने वाले अवसर नए लोगों को समय के साथ आत्मनिर्भर बना पाएंगे या नहीं।
जेसिका अपने अनुभव के बारे में बताती हैं, “भारत से आने वाला कोई विद्यार्थी गणित, विज्ञान या इतिहास पहले से अच्छी तरह जानता हो सकता है। लेकिन उसी ज्ञान को नई भाषा में व्यक्त करने में अधिक समय लग सकता है। कभी-कभी निर्देशों को दोबारा पढ़ना पड़ता है। जिस सवाल का जवाब अपनी परिचित भाषा में आसानी से दिया जा सकता है, उसे हिब्रू में समझाना मुश्किल हो सकता है।”
जिन किशोरों की पढ़ाई बीच में रुक गई हो, उनके लिए नई शिक्षा व्यवस्था में ढलना और भी कठिन हो सकता है। उन्हें अपनी शैक्षणिक स्थिति तय करनी पड़ सकती है, परीक्षा के अपरिचित नियम समझने पड़ सकते हैं और यह पता लगाना पड़ सकता है कि वे कौन-से पाठ्यक्रमों में दाखिला ले सकते हैं।
जेसिका का अनुभव बताता है कि केवल दूसरे देश में पहुंच जाने से बेहतर शैक्षणिक परिणाम अपने आप नहीं मिलते। अवसर मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनका लाभ उठाने के लिए भाषा पर पकड़ और संस्थागत सहायता भी जरूरी है।
भाषा सीखना पढ़ाई के साथ सामाजिक जीवन के लिए भी जरूरी
अवियेला बताती हैं कि भाषा की कमी का असर केवल पढ़ाई या नौकरी पर नहीं पड़ता, बल्कि लोगों के सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। जिस बच्चे को अपने सहपाठियों की बातचीत समझने में परेशानी होती है, उसके लिए दोस्त बनाना और स्कूल में सहज महसूस करना मुश्किल हो सकता है। इसी तरह, हिब्रू का सीमित ज्ञान होने पर वयस्कों को सरकारी अधिकारियों, नियोक्ताओं और पड़ोसियों से रोजमर्रा की बातचीत करने में भी परेशानी हो सकती है।
इसलिए भाषा प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल कक्षा में पढ़ाई तक सीमित नहीं है। यह नए लोगों को उन सामान्य बातचीत और गतिविधियों में शामिल होने में मदद करता है, जिनके माध्यम से वे किसी नई जगह और वहां के समाज से जुड़ते हैं।
स्थानीय भाषाओं की मदद से हिब्रू सिखाने की कोशिश
हिब्रू भाषा की शिक्षिका अमित कोहेन 2012 से बनी मनाशे समुदाय के विद्यार्थियों के साथ काम कर रही हैं। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने सीखा है कि नए लोगों को भाषा सिखाने के लिए उनकी पहले से सीखी गई भाषाओं और जीवन के अनुभवों को समझना जरूरी है।
उनके काम में इजरायल के विभिन्न विश्वविद्यालयों और पुनर्वास केंद्रों में हिब्रू पढ़ाना शामिल है। उन्होंने इस समुदाय के विद्यार्थियों की मदद के लिए हिब्रू-कुकी और हिब्रू-मिजो शब्दकोश जैसे शैक्षणिक संसाधन भी तैयार किए हैं।
इन संसाधनों के पीछे विचार सरल है। जब विद्यार्थी किसी नए शब्द को अपनी परिचित भाषा के शब्द से जोड़ पाते हैं, तो उसे समझना और याद रखना आसान हो जाता है।
बनी मनाशे समुदाय के विद्यार्थियों के लिए कुकी या मिजो भाषा हिब्रू शब्दों और अभिव्यक्तियों को समझने का शुरुआती आधार बन सकती है। कोहेन के अनुसार, हर नए शब्द को बिना किसी संदर्भ के सीखने के बजाय विद्यार्थी अपनी मौजूदा भाषाई जानकारी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इजरायल में अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए कोहेन ने इस बात पर जोर दिया कि सभी विद्यार्थियों पर एक ही शिक्षण पद्धति लागू करना सही नहीं है। शिक्षकों को विद्यार्थियों की बातें सुननी चाहिए और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझना चाहिए।
वह कहती हैं, “प्रवासियों के साथ सफलतापूर्वक काम करने के लिए उनकी अनूठी संस्कृति को जानना, उनकी बात सुनना, उनसे सीखना, विनम्रता के साथ काम करना और खुले मन से बातचीत करना बहुत जरूरी है।”
कोहेन अपने काम को केवल शिक्षक की भूमिका तक सीमित नहीं मानतीं। वह कहती हैं, “जब मैं बनी मनाशे समुदाय के लोगों के साथ होती हूं, तो मेरे लिए सिर्फ शिक्षक होना नहीं, बल्कि एक विद्यार्थी बने रहना भी महत्वपूर्ण है।”
उनका यह नजरिया भाषा शिक्षा के एक अहम पहलू की ओर ध्यान दिलाता है। विद्यार्थी अपने साथ केवल नई चीजें सीखने की जरूरत लेकर नहीं आते, बल्कि वे अपनी भाषाएं, पारिवारिक इतिहास और सीखने के अनुभव भी साथ लाते हैं। इन अनुभवों को महत्व देने से शिक्षकों को हिब्रू भाषा सिखाने के अधिक प्रभावी तरीके खोजने में मदद मिल सकती है।
पुराने अनुभव बताते हैं कि शुरुआती मदद क्यों जरूरी है
एस्थर कोलनोय मिजोरम में बनी मनाशे समुदाय के बीच पली-बढ़ीं। बचपन में कुछ बच्चे उनके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते थे, उन्हें यहूदी होने के लिए चिढ़ाते थे और उनकी धार्मिक मान्यताओं का मजाक उड़ाते थे।
1999 में, जब वह 15 वर्ष की थीं, तब अपने माता-पिता और दो भाई-बहनों के साथ इजरायल चली गईं। वहां उन्हें नए स्कूल के माहौल में ढलने के साथ-साथ हिब्रू सीखनी पड़ी और धर्मांतरण से जुड़ी कक्षाओं में भी हिस्सा लेना पड़ा।
वह कहती हैं, “नए देश में खुद को ढालना, एक अपरिचित भाषा सीखना और पढ़ाई तथा धर्म से जुड़ी जिम्मेदारियां पूरी करना आसान नहीं था। उस समय एक किशोरी के लिए यह सब काफी मुश्किल था।”
बाद में कोलनोय इजरायल में बनी मनाशे समुदाय की पहली सामाजिक कार्यकर्ता बनीं।
उनका सफर बताता है कि शुरुआती मुश्किलों से निकलने का रास्ता मिलने पर नए प्रवासी आगे चलकर क्या हासिल कर सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति का अनुभव एक जैसा नहीं होता, लेकिन इससे यह जरूर समझ आता है कि शुरुआती वर्षों में मिलने वाली मदद कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसकी जरूरत भाषा का पहला कोर्स पूरा होने के बाद भी बनी रह सकती है।
शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने की चुनौती
दिव्यांग बच्चों के साथ काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन जेओ फाउंडेशन के अध्यक्ष डैनियल थोंग का मानना है कि युवा बनी मनाशे प्रवासियों के लिए शिक्षा रोजगार और पेशेवर जीवन में प्रवेश का रास्ता खोल सकती है। लेकिन केवल इच्छाशक्ति और मेहनत से यह लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं है। विद्यार्थियों को पढ़ाई जारी रखने और नियोक्ताओं की ओर से मान्यता प्राप्त योग्यताएं हासिल करने के अवसर भी चाहिए।
मणिपुर और मिजोरम के कुछ हिस्सों में परिवार खेती और असंगठित क्षेत्र में होने वाले काम पर निर्भर हैं। मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय संघर्ष ने प्रभावित इलाकों के लोगों की जिंदगी को और मुश्किल बनाया है। वहां स्कूलों और सामान्य जनजीवन पर भी असर पड़ा है।
ऐसे में, इजरायल सरकार की 2030 तक बनी मनाशे समुदाय के शेष लगभग 5,800 लोगों को वहां बसाने की योजना का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने लोग वहां पहुंचते हैं। इसका वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि परिवार सुरक्षित रूप से बस पाते हैं या नहीं, विद्यार्थी अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं या नहीं और वयस्क स्थायी रोजगार के जरिए अपनी आजीविका बना पाते हैं या नहीं।
इजरायल की राजनीति और समाज पर भी पड़ सकता है असर
इस प्रवास का एक राजनीतिक पहलू भी है। इजरायल की प्रवासन नीति का उसके यहूदी राष्ट्रीय और धार्मिक स्वरूप से गहरा संबंध है। हजारों नए लोगों के आने से देश के उत्तरी हिस्सों में आबादी बढ़ाने और स्थानीय समुदायों के विकास में योगदान मिल सकता है।
बनी मनाशे समुदाय के सदस्य जब नागरिकता हासिल कर मतदान के योग्य होंगे, तो वे इजरायल के चुनावों में भी हिस्सा ले सकेंगे। इस समुदाय के लोगों की धार्मिक पहचान ऑर्थोडॉक्स यहूदी परंपरा से जुड़ी है।
हालांकि, समाज में उनकी वास्तविक भागीदारी केवल धार्मिक पहचान या नागरिकता तक सीमित नहीं होगी। शिक्षा और रोजगार के अवसर भी यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि नए प्रवासी खुद को इजरायली समाज का हिस्सा कितना महसूस करते हैं और वहां की संस्थाओं के प्रति उनका नजरिया कैसा बनता है।
डैनियल थोंग कहते हैं कि मिजोरम और आसपास के क्षेत्रों में मैतेई और नगा समुदायों ने भी इन घटनाक्रमों का प्रभाव महसूस किया है। उनके मुताबिक, सामान्य स्थिति बहाल करने और शिक्षा व्यवस्था को लगातार जारी रखने में कई साल लग सकते हैं।
थोंग का कहना है कि बनी मनाशे समुदाय के कई लोग इजरायल में अपनी जिंदगी बसा रहे हैं और उनमें से कुछ इजरायली सेना में भी सेवा दे रहे हैं। वह यह भी स्वीकार करते हैं कि इजरायली सरकार ने इस समुदाय के प्रवास में मदद की है, लेकिन उनकी उत्पत्ति और पहचान को लेकर उठने वाले सवालों के कारण कुछ लोगों के बीच संदेह भी बना हुआ है।
हिब्रू सीखना शुरुआत है, मंजिल नहीं
डैनियल थोंग की इच्छा है कि आम नागरिकों को शांति मिले, विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हो और अलग-अलग समुदायों तथा संगठनों के बीच बेहतर तालमेल बने।
वह कहते हैं, “एक विद्यार्थी को अब भी पाठ्यपुस्तक पढ़ना, शिक्षक की बात समझना और परीक्षा में बैठना सीखना होता है। एक अभिभावक को अब भी नौकरी तलाशनी होती है। एक परिवार को अब भी नए समाज में अपने लिए जगह बनानी होती है।”
हिब्रू भाषा की कक्षाएं इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत कर सकती हैं, लेकिन सफलता का वास्तविक पैमाना यह होगा कि आगे मिलने वाले अवसरों का इस्तेमाल करके बनी मनाशे समुदाय के लोग अपने लिए कैसा भविष्य बना पाते हैं।




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