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UGC के नए नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र सरकार समिति बनाने की तैयारी में; सुप्रीम कोर्ट में दी जानकारी

UGC Equity Regulations 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर समीक्षा की तैयारी कर रही है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह इन नियमों पर दोबारा विचार करने के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है। इस मामले में 5 नवंबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को यह जानकारी दी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर विचार कर रही है, ताकि विद्यार्थियों की चिंताओं का समाधान किया जा सके और किसी भी वर्ग के मन में असंतोष या आशंका न रहे। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि हर विद्यार्थी के हितों का ध्यान रखा जाए और नई पीढ़ी के भविष्य को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाए।

सरकार की ओर से समिति बनाने पर विचार किए जाने की जानकारी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समिति का गठन कब होगा, इसमें कौन-कौन सदस्य शामिल होंगे और समीक्षा की प्रक्रिया कितने समय में पूरी की जाएगी।

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूजीसी के नियमों की समीक्षा करते समय सभी विद्यार्थियों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि युवा पीढ़ी की चिंताओं, कल्याण और भविष्य को इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में रखा जाना चाहिए।

यह मामला ‘अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ’ (Abeda Salim Tadvi vs Union of India) और इससे जुड़ी अन्य याचिकाओं से संबंधित है। इन याचिकाओं में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और विद्यार्थियों की शिकायतों के समाधान के लिए मजबूत व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

अदालत ने केंद्र सरकार के ताजा रुख को देखते हुए अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद करने का फैसला किया है। 

UGC के 2026 के समानता नियमों को लेकर विवाद क्यों हुआ?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए जनवरी 2026 में नए नियम अधिसूचित किए थे। इनका पूरा नाम ‘यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026’ है।

इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकना, विद्यार्थियों को सुरक्षित शैक्षणिक माहौल देना और शिकायतों के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना था। नए नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) और समानता समिति (Equity Committee) जैसी व्यवस्थाएं बनाने का प्रावधान किया गया था।

हालांकि, नियमों की कुछ व्यवस्थाओं को लेकर विवाद शुरू हो गया। खासतौर पर जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायत दर्ज कराने के दायरे को लेकर सवाल उठाए गए। कुछ याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नियमों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव पर विशेष ध्यान दिया गया है, लेकिन सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों की शिकायतों के लिए समान रूप से स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

दूसरी ओर, नए नियमों के समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की समस्या को देखते हुए कमजोर और वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को प्रभावी सुरक्षा देना जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर नियमों के पक्ष और विरोध में अलग-अलग तर्क सामने आए। 

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में नए नियमों पर क्यों लगाई थी रोक?

यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में इनके लागू होने पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने शुरुआती तौर पर नियमों की कुछ व्यवस्थाओं को अस्पष्ट बताया था और आशंका जताई थी कि इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक मामले में आगे कोई फैसला नहीं होता, तब तक यूजीसी के वर्ष 2012 के समानता संबंधी नियम लागू रहेंगे। इसका अर्थ है कि फिलहाल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वर्ष 2026 के नए नियम प्रभावी नहीं हैं। अदालत के अगले आदेश तक वर्ष 2012 के नियमों के तहत ही व्यवस्था जारी रहेगी।

अदालत की चिंता मुख्य रूप से नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा और शिकायत निवारण व्यवस्था के दायरे को लेकर थी। इसी वजह से नियमों की भाषा और उनके संभावित प्रभावों की विस्तृत समीक्षा की जरूरत महसूस की गई। 

2019 में शुरू हुआ था यह मामला, रोहित वेमुला और पायल तड़वी से जुड़ी हैं याचिकाएं

यूजीसी के नए समानता नियमों से जुड़ा मामला वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका से जुड़ा है। यह याचिका रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर की गई थी। दोनों की मौत के बाद उनके परिवारों ने उच्च शिक्षा संस्थानों में कथित जातिगत भेदभाव और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होने का मुद्दा उठाया था।

याचिका में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी। इसके बाद यूजीसी ने इस विषय पर विभिन्न पक्षों से विचार-विमर्श किया और जनवरी 2026 में वर्ष 2012 के नियमों की जगह नए नियम अधिसूचित किए।

हालांकि, नए नियमों को लेकर उठे सवालों और कानूनी चुनौती के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इनके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। इस तरह मामला अब केवल भेदभाव रोकने की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नियमों की निष्पक्षता, उनकी भाषा और सभी विद्यार्थियों के लिए शिकायत निवारण की समान व्यवस्था जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए हैं। 

अगस्त 2026 में भी केंद्र सरकार ने कही थी समीक्षा की बात

यूजीसी के नए नियमों की समीक्षा को लेकर केंद्र सरकार पहले भी सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दे चुकी है। अगस्त 2026 में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि नियम सरकार के सक्रिय विचाराधीन हैं।

उस समय सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। अब 5 नवंबर की सुनवाई में केंद्र सरकार ने समिति गठित करने की संभावना जताई है।

हालांकि, सरकार की ओर से अभी समिति के औपचारिक गठन या उसकी कार्ययोजना का विवरण नहीं दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी है। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार समीक्षा के लिए क्या व्यवस्था बनाती है और यूजीसी के नए नियमों में क्या बदलाव प्रस्तावित किए जाते हैं। 

विद्यार्थियों के लिए फिलहाल क्या है स्थिति?

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की रोक के कारण यूजीसी के 2026 के नए समानता नियम लागू नहीं हैं। अंतरिम व्यवस्था के तहत वर्ष 2012 के नियम ही प्रभावी हैं।

केंद्र सरकार की प्रस्तावित समीक्षा और समिति के गठन के बाद नए नियमों में बदलाव की संभावना बन सकती है। लेकिन जब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक फैसला और सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश नहीं आता, तब तक मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बदलाव नहीं माना जाएगा।

इस पूरे मामले का अंतिम उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसा माहौल सुनिश्चित करना है, जहां किसी भी विद्यार्थी के साथ जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव न हो और हर विद्यार्थी को अपनी शिकायत रखने तथा न्याय पाने का समान अवसर मिले।

Raish Ahmed

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